- Toráh: Génesis 7:17-8:14
- Haftaráh: Isaías 55:6-13, Enfocándose en buscar a Adonái y la renovación de la tierra tras el juicio.
- Brit Hadasháh: Hebreos 11:7, Resaltando la fe de Noaj (Noé) en obedecer la instrucción divina para salvar a su familia.
¡Baruj HaShem! Con alegría y reverencia, presento este estudio profundo de la Aliyá 3 de Parashá Noaj, desde la perspectiva del Reino de Yeshúa HaMashíaj, para la edificación de los talmidím (discípulos) y la gloria de Elohím. Que la Ruaj HaKodesh ilumine nuestro entendimiento.
Punto 1. Génesis 7:17-8:14
Texto Interlineal Anotado Hebreo-Español
| Texto Hebreo | Palabra Hebrea | Fonética (Tiberiana) | Traducción Palabra por Palabra |
| Bereshit 7:17 | |||
| וַיְהִי | Va-ye-hí | Y fue | |
| הַמַּבּוּל | ha-ma-búl | el diluvio | |
| אַרְבָּעִים | Ar-ba’ím | cuarenta | |
| יוֹם | Yóm | día(s) | |
| עַל | Al | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיִּרְבּוּ | Va-yír-bu | y se multiplicaron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| וַיִּשְׂאוּ | Va-yis-ú | y levantaron | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| וַתָּרָם | Va-ta-róm | y se elevó | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| Bereshit 7:18 | |||
| וַיִּגְבְּרוּ | Va-yig-be-rú | Y prevalecieron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| וַיִּרְבּוּ | Va-yír-bu | y se multiplicaron | |
| מְאֹד | Me-ód | en gran manera | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַתֵּלֶךְ | Va-té-lej | y anduvo (flotó) | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| פְּנֵי | pe-néi | la faz de | |
| הַמָּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| Bereshit 7:19 | |||
| וְהַמַּיִם | Ve-ha-máy-im | Y las aguas | |
| גָּבְרוּ | Gá-ve-ru | prevalecieron | |
| מְאֹד | Me-ód | en gran manera | |
| מְאֹד | Me-ód | en gran manera | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיְכֻסּוּ | Va-ye-ju-sú | y fueron cubiertas | |
| כָּל־ | Kol- | todas | |
| הֶהָרִים | he-ha-rím | las montañas | |
| הַגְּבֹהִים | ha-gue-vohím | las altas | |
| אֲשֶׁר | a-shér | que | |
| תַּחַת | Tá-jat | bajo | |
| כָּל־ | Kol- | todo | |
| הַשָּׁמָיִם | ha-sha-máy-im | el cielo | |
| Bereshit 7:20 | |||
| חֲמֵשׁ | Ja-mésh | Quince | |
| עֶשְׂרֵה | Es-réh | (y) diez | |
| אַמָּה | Am-máh | codo(s) | |
| מִלְמַעְלָה | Mil-ma-láh | desde arriba | |
| גָּבְרוּ | Gá-ve-ru | prevalecieron | |
| הַמָּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| וַיְכַסּוּ | Va-ye-ja-sú | y cubrieron | |
| הֶהָרִים | he-ha-rím | las montañas | |
| Bereshit 7:21 | |||
| וַיִּגְוַע | Va-yíg-va | Y expiró (murió) | |
| כָּל־ | Kol- | toda | |
| בָּשָׂר | Ba-sár | carne | |
| הָרֹמֵשׂ | ha-ro-mésh | la que se arrastra | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| בָּעוֹף | Ba-óf | en las aves | |
| וּבַבְּהֵמָה | U-va-be-he-máh | y en el ganado | |
| וּבַחַיָּה | U-va-ja-yáh | y en el animal salvaje | |
| וּבְכָל־ | U-ve-jol- | y en todo | |
| הַשֶּׁרֶץ | ha-shé-rets | el reptil | |
| הַשֹּׁרֵץ | ha-sho-réts | que repta | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וְכֹל | Ve-jol | y todo | |
| הָאָדָם | ha-a-dám | el hombre (humanidad) | |
| Bereshit 7:22 | |||
| כֹּל | Kol | Todo | |
| אֲשֶׁר | a-shér | aquello que | |
| נִשְׁמַת־ | Nish-mát- | aliento de | |
| רוּחַ | Rú-aj | espíritu (vida) | |
| חַיִּים | Ja-yím | de vida | |
| בְּאַפָּיו | Be-a-páv | en sus narices | |
| מִכֹּל | Mi-kol | de todo | |
| אֲשֶׁר | a-shér | aquello que | |
| בֶּחָרָבָה | be-ja-ra-váh | en la tierra seca | |
| מֵתוּ | Mé-tu | murieron | |
| Bereshit 7:23 | |||
| וַיְמַח | Va-ye-máj | Y borró (exterminó) | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| כָּל־ | Kol- | toda | |
| הַיְקוּם | ha-ye-kúm | la existencia (criatura viviente) | |
| אֲשֶׁׁר | a-shér | que | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| פְּנֵי | pe-néi | la faz de | |
| הָאֲדָמָה | ha-a-da-máh | la tierra cultivable | |
| מֵאָדָם | Me-a-dám | de hombre | |
| עַד־ | Ad- | hasta | |
| בְּהֵמָה | Be-he-máh | ganado | |
| עַד־ | Ad- | hasta | |
| רֶמֶשׂ | Ré-mes | reptil | |
| וְעַד־ | Ve-ad- | y hasta | |
| עוֹף | Óf | ave | |
| הַשָּׁמַיִם | ha-sha-máy-im | del cielo | |
| וַיִּמָּחוּ | Va-yi-ma-jú | y fueron borrados (exterminados) | |
| מִן־ | Min- | de | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיִּשָּׁאֵר | Va-yi-sha-ér | y quedó | |
| אַךְ־ | Aj- | solamente | |
| נֹחַ | Nó-aj | Nóaj (Noé) | |
| וַאֲשֶׁר | Va-a-shér | y aquel que | |
| אִתּוֹ | It-tó | con él | |
| בַּתֵּבָה | Ba-te-váh | en el arca | |
| Bereshit 7:24 | |||
| וַיִּגְבְּרוּ | Va-yig-be-rú | Y prevalecieron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| חֲמִשִּׁים | Ja-mi-shím | cincuenta | |
| וּמְאַת | U-mé-at | y ciento | |
| יוֹם | Yóm | día(s) | |
| Bereshit 8:1 | |||
| וַיִּזְכֹּר | Va-yiz-kór | Y recordó | |
| אֱלֹהִים | Elohím | Elohím | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| נֹחַ | Nó-aj | Nóaj | |
| וְאֵת | Ve-et | y a | |
| כָּל־ | Kol- | todo | |
| הַחַיָּה | ha-ja-yáh | el animal salvaje | |
| וְאֶת־ | Ve-et- | y a | |
| כָּל־ | Kol- | todo | |
| הַבְּהֵמָה | ha-be-he-máh | el ganado | |
| אֲשֶׁר | a-shér | que | |
| אִתּוֹ | It-tó | con él | |
| בַּתֵּבָה | Ba-te-váh | en el arca | |
| וַיַּעֲבֵר | Va-ya-a-vér | e hizo pasar | |
| אֱלֹהִים | Elohím | Elohím | |
| רוּחַ | Rú-aj | un viento/espíritu | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיָּשֹׁכּוּ | Va-ya-shó-ku | y se apaciguaron | |
| הַמָּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| Bereshit 8:2 | |||
| וַיִּסָּכְרוּ | Va-yi-sa-je-rú | Y fueron cerradas | |
| מַעְיְנֹת | Ma-ye-nót | fuentes de | |
| תְּהוֹם | Te-hóm | abismo | |
| וַאֲרֻבֹּת | Va-a-ru-bót | y compuertas de | |
| הַשָּׁמָיִם | ha-sha-máy-im | los cielos | |
| וַיִּכָּלֵא | Va-yi-ka-lé | y fue detenido | |
| הַגֶּשֶׁם | ha-gué-shem | la lluvia | |
| מִן־ | Min- | de | |
| הַשָּׁמָיִם | ha-sha-máy-im | los cielos | |
| Bereshit 8:3 | |||
| וַיָּשֻׁבוּ | Va-ya-shú-vu | Y regresaron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| הָלוֹךְ | Ha-ló-j | yendo | |
| וָשׁוֹב | Va-shóv | y volviendo | |
| וַיַּחְסְרוּ | Va-yaj-se-rú | y disminuyeron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מִקְצֵה | Mik-tséh | al cabo de | |
| חֲמִשִּׁים | Ja-mi-shím | cincuenta | |
| וּמְאַת | U-mé-at | y ciento | |
| יוֹם | Yóm | día(s) | |
| Bereshit 8:4 | |||
| וַתָּנַח | Va-tá-naj | Y reposó | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| בַּחֹדֶשׁ | Ba-jó-desh | en el mes | |
| הַשְּׁבִיעִי | ha-she-vi-í | el séptimo | |
| בְּשִׁבְעָה | Be-shiv-‘áh | en el diecisiete | |
| עָשָׂר | A-sár | (y) diez | |
| יוֹם | Yóm | día | |
| לַחֹדֶשׁ | la-jó-desh | del mes | |
| עַל | Al | sobre | |
| הָרֵי | ha-réi | los montes de | |
| אֲרָרָט | A-ra-rát | Ararát | |
| Bereshit 8:5 | |||
| וְהַמַּיִם | Ve-ha-máy-im | Y las aguas | |
| הָיוּ | Ha-yú | estuvieron | |
| הָלוֹךְ | Ha-ló-j | yendo | |
| וְחָסוֹר | Ve-ja-sór | y disminuyendo | |
| עַד | Ad | hasta | |
| הַחֹדֶשׁ | ha-jó-desh | el mes | |
| הָעֲשִׂירִי | ha-a-si-rí | el décimo | |
| בָּעֲשִׂירִי | Ba-a-si-rí | en el décimo | |
| בְּאֶחָד | Be-e-jád | en el uno | |
| לַחֹדֶשׁ | la-jó-desh | del mes | |
| נִרְאוּ | Nir-ú | fueron vistas | |
| רָאשֵׁי | Ra-shéi | las cabezas de | |
| הֶהָרִים | he-ha-rím | las montañas | |
| Bereshit 8:6 | |||
| וַיְהִי | Va-ye-hí | Y fue | |
| מִקֵּץ | Mi-kéts | al cabo de | |
| אַרְבָּעִים | Ar-ba’ím | cuarenta | |
| יוֹם | Yóm | día(s) | |
| וַיִּפְתַּח | Va-yif-táj | y abrió | |
| נֹחַ | Nó-aj | Nóaj | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| חַלּוֹן | Jal-lón | la ventana | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | del arca | |
| אֲשֶׁר | a-shér | que | |
| עָשָׂה | a-sáh | él hizo | |
| Bereshit 8:7 | |||
| וַיְשַׁלַּח | Va-ye-sha-laj | Y envió | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| הָעֹרֵב | ha-o-rév | el cuervo | |
| וַיֵּצֵא | Va-ye-tsé | y salió | |
| יָצוֹא | Ya-tsó | saliendo | |
| וָשׁוֹב | Va-shóv | y volviendo | |
| עַד־ | Ad- | hasta | |
| יְבֹשֶׁת | Ye-vó-shet | secarse | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| Bereshit 8:8 | |||
| וַיְשַׁלַּח | Va-ye-sha-laj | Y envió | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| הַיּוֹנָה | ha-yo-náh | la paloma | |
| מֵאִתּוֹ | Me-it-tó | de junto a él | |
| לִרְאוֹת | Lir-ót | para ver | |
| הֲקַלּוּ | Ha-kal-lú | si habían disminuido | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| פְּנֵי | pe-néi | la faz de | |
| הָאֲדָמָה | ha-a-da-máh | la tierra cultivable | |
| Bereshit 8:9 | |||
| וְלֹא־ | Ve-ló- | Y no | |
| מָצְאָה | Ma-tsá | encontró | |
| הַיּוֹנָה | ha-yo-náh | la paloma | |
| מָנוֹחַ | Má-no-aj | lugar de reposo | |
| לְכַף | Le-jáf | para la planta de | |
| רַגְלָהּ | Rag-láh | su pie | |
| וַתָּשָׁב | Va-tá-shav | y regresó | |
| אֵלָיו | E-láv | hacia él | |
| אֶל־ | El- | a | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| כִּי־ | Ki- | porque | |
| מַיִם | Máy-im | aguas | |
| עַל־ | Al- | sobre | |
| פְּנֵי | pe-néi | la faz de | |
| כָל־ | Kol- | toda | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיִּשְׁלַח | Va-yish-laj | y extendió | |
| יָדוֹ | Ya-dó | su mano | |
| וַיִּקָּחֶהָ | Va-yik-ka-jë-há | y la tomó | |
| וַיָּבֵא | Va-ya-vé | y la hizo entrar | |
| אֹתָהּ | O-táh | a ella | |
| אֵלָיו | E-láv | hacia él | |
| אֶל־ | El- | a | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| Bereshit 8:10 | |||
| וַיְיַחֵל | Va-ya-jél | Y esperó | |
| עוֹד | Od | aún | |
| שִׁבְעַת | Shiv-át | siete | |
| יָמִים | Ya-mím | día(s) | |
| אֲחֵרִים | a-je-rím | otros | |
| וַיֹּסֶף | Va-yó-sef | y continuó | |
| שַׁלַּח | Sha-laj | enviando | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| הַיּוֹנָה | ha-yo-náh | la paloma | |
| מִן־ | Min- | de | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| Bereshit 8:11 | |||
| וַתָּבֹא | Va-tá-vo | Y vino | |
| אֵלָיו | E-láv | hacia él | |
| הַיּוֹנָה | ha-yo-náh | la paloma | |
| לְעֵת | Le-ét | al tiempo de | |
| עֶרֶב | É-rev | la tarde | |
| וְהִנֵּה | Ve-hin-néh | y he aquí | |
| עֲלֵה־ | A-léh- | hoja de | |
| זַיִת | Zá-yit | olivo | |
| טָרָף | Tá-raf | fresca | |
| בְּפִיהָ | Be-fí-ha | en su boca | |
| וַיֵּדַע | Va-yé-da | y supo | |
| נֹחַ | Nó-aj | Nóaj | |
| כִּי־ | Ki- | que | |
| קַלּוּ | Kal-lú | habían disminuido | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| Bereshit 8:12 | |||
| וַיִּיָּחֶל | Va-yi-yá-jel | Y esperó | |
| עוֹד | Od | aún | |
| שִׁבְעַת | Shiv-át | siete | |
| יָמִים | Ya-mím | día(s) | |
| אֲחֵרִים | a-je-rím | otros | |
| וַיְשַׁלַּח | Va-ye-sha-laj | y envió | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| הַיּוֹנָה | ha-yo-náh | la paloma | |
| וְלֹא־ | Ve-ló- | y no | |
| יָסְפָה | Ya-se-fáh | continuó | |
| שׁוּב | Shúv | volviendo | |
| אֵלָיו | E-láv | hacia él | |
| עוֹד | Od | nunca más | |
| Bereshit 8:13 | |||
| וַיְהִי | Va-ye-hí | Y fue | |
| בְּאַחַת | Be-a-ját | en el uno | |
| וְשֵׁשׁ־ | Ve-shésh- | y seiscientos | |
| מֵאוֹת | me-ót | de años | |
| שָׁנָה | Sha-náh | de año | |
| בָּרִאשׁוֹן | Ba-rish-ón | en el primero | |
| בְּאֶחָד | Be-e-jád | en el uno | |
| לַחֹדֶשׁ | la-jó-desh | del mes | |
| חָרְבוּ | Jar-vú | se secaron | |
| הַמַּיִם | ha-máy-im | las aguas | |
| מֵעַל | me-ál | de sobre | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra | |
| וַיָּסַר | Va-yá-sar | y quitó | |
| נֹחַ | Nó-aj | Nóaj | |
| אֶת־ | Et- | (marca objeto directo) | |
| מִכְסֵה | Mij-séh | la cubierta de | |
| הַתֵּבָה | ha-te-váh | el arca | |
| וַיַּרְא | Va-yár | y vio | |
| וְהִנֵּה | Ve-hin-néh | y he aquí | |
| חָרְבָה | Jar-váh | seca | |
| פְּנֵי | pe-néi | la faz de | |
| הָאֲדָמָה | ha-a-da-máh | la tierra cultivable | |
| Bereshit 8:14 | |||
| וּבַחֹדֶשׁ | U-va-jó-desh | Y en el mes | |
| הַשֵּׁנִי | ha-she-ní | el segundo | |
| בְּשִׁבְעָה | Be-shiv-‘áh | en el veintisiete | |
| וְעֶשְׂרִים | Ve-es-rím | y veinte | |
| יוֹם | Yóm | día | |
| לַחֹדֶשׁ | la-jó-desh | del mes | |
| יָבְשָׁה | Ya-ve-sháh | se secó | |
| הָאָרֶץ | ha-Á-rets | la tierra |
Traducción Literal al Español:
Bereshit 7:17 Y fue el diluvio cuarenta día(s) sobre la tierra, y se multiplicaron las aguas, y levantaron el arca, y se elevó de sobre la tierra.
Bereshit 7:18 Y prevalecieron las aguas, y se multiplicaron en gran manera sobre la tierra, y flotó el arca sobre la faz de las aguas.
Bereshit 7:19 Y las aguas prevalecieron en gran manera, en gran manera sobre la tierra, y fueron cubiertas todas las montañas las altas que bajo todo el cielo.
Bereshit 7:20 Quince codo(s) desde arriba prevalecieron las aguas, y cubrieron las montañas.
Bereshit 7:21 Y expiró toda carne, la que se arrastra sobre la tierra, en las aves y en el ganado y en el animal salvaje y en todo el reptil que repta sobre la tierra, y toda la humanidad.
Bereshit 7:22 Todo aquello que aliento de espíritu de vida en sus narices, de todo aquello que en la tierra seca, murieron.
Bereshit 7:23 Y borró toda la existencia que sobre la faz de la tierra cultivable; de hombre hasta ganado, hasta reptil, y hasta ave del cielo, y fueron borrados de la tierra, y quedó solamente Nóaj y aquel que con él en el arca.
Bereshit 7:24 Y prevalecieron las aguas sobre la tierra cincuenta y ciento día(s).
Bereshit 8:1 Y recordó Elohím a Nóaj, y a todo el animal salvaje, y a todo el ganado que con él en el arca; e hizo pasar Elohím un viento/espíritu sobre la tierra, y se apaciguaron las aguas.
Bereshit 8:2 Y fueron cerradas fuentes de abismo, y compuertas de los cielos, y fue detenido la lluvia de los cielos.
Bereshit 8:3 Y regresaron las aguas de sobre la tierra, yendo y volviendo, y disminuyeron las aguas al cabo de cincuenta y ciento día(s).
Bereshit 8:4 Y reposó el arca en el mes el séptimo, en el diecisiete día del mes, sobre los montes de Ararát.
Bereshit 8:5 Y las aguas estuvieron yendo y disminuyendo hasta el mes el décimo; en el décimo, en el uno del mes, fueron vistas las cabezas de las montañas.
Bereshit 8:6 Y fue al cabo de cuarenta día(s), y abrió Nóaj la ventana del arca que él hizo.
Bereshit 8:7 Y envió el cuervo, y salió saliendo y volviendo hasta secarse las aguas de sobre la tierra.
Bereshit 8:8 Y envió la paloma de junto a él para ver si habían disminuido las aguas de sobre la faz de la tierra cultivable.
Bereshit 8:9 Y no encontró la paloma lugar de reposo para la planta de su pie, y regresó hacia él al arca, porque aguas sobre la faz de toda la tierra; y extendió su mano, y la tomó, y la hizo entrar a ella hacia él al arca.
Bereshit 8:10 Y esperó aún siete día(s) otros, y continuó enviando la paloma de el arca.
Bereshit 8:11 Y vino hacia él la paloma al tiempo de la tarde, y he aquí hoja de olivo fresca en su boca; y supo Nóaj que habían disminuido las aguas de sobre la tierra.
Bereshit 8:12 Y esperó aún siete día(s) otros, y envió la paloma, y no continuó volviendo hacia él nunca más.
Bereshit 8:13 Y fue en el uno y seiscientos de años de año, en el primero, en el uno del mes, se secaron las aguas de sobre la tierra; y quitó Nóaj la cubierta del arca, y vio y he aquí seca la faz de la tierra cultivable.
Bereshit 8:14 Y en el mes el segundo, en el veintisiete día del mes, se secó la tierra.
Punto 2. Haftaráh
Haftaráh: Yeshayáhu (Isaías) 55:6-13, Enfocándose en buscar a Adonái y la renovación de la tierra tras el juicio.
Texto Interlineal Anotado Hebreo-Español
| Texto Hebreo | Palabra Hebrea | Fonética (Tiberiana) | Traducción Palabra por Palabra |
| Yeshayáhu 55:6 | |||
| דִּרְשׁוּ | Dir-shú | Buscad | |
| יְהוָה | Adonái | Adonái | |
| בְּהִמָּצְאוֹ | Be-hi-ma-tsó | al ser hallado Él | |
| קְרָאֻהוּ | Ke-ra-ú-hu | llamadle | |
| בִּהְיוֹתוֹ | Bi-hey-o-tó | mientras está | |
| קָרוֹב | Ka-róv | cerca | |
| Yeshayáhu 55:7 | |||
| יַעֲזֹב | Ya-a-zóv | Deje | |
| רָשָׁע | Ra-shá | el perverso | |
| דַּרְכּוֹ | Dar-kó | su camino | |
| וְאִישׁ | Ve-ish | y el hombre | |
| אָוֶן | Á-ven | de iniquidad | |
| מַחְשְׁבֹתָיו | Maj-she-vó-tav | sus pensamientos | |
| וְיָשֹׁב | Ve-ya-shóv | y regrese | |
| אֶל־ | El- | a | |
| יְהוָה | Adonái | Adonái |
Comentario Mesiánico:
La Haftaráh, Yeshayáhu 55:6-13, se conecta profundamente con la Parasháh Noaj al presentar la respuesta de Adonái después del juicio. La Parasháh relata un juicio universal que culmina en la destrucción de toda carne, y el posterior recuerdo de Elohím a Nóaj (Bereshit 8:1). Este juicio, aunque devastador, no es el final de la relación de Adonái con Su creación. La Haftaráh, por su parte, ofrece un llamado urgente al arrepentimiento: “Buscad a Adonái mientras puede ser hallado, llamadle mientras está cerca” (Yeshayáhu 55:6). Este es el tema esencial de la Toráh de Nóaj: el juicio exige una respuesta, y la respuesta esperada es Teshuváh (Arrepentimiento).
La promesa mesiánica se teje en el llamado a la renovación. El pasaje de Yeshayáhu profetiza un Pacto Eterno de misericordia para la descendencia de David (Yeshayáhu 55:3), que es la promesa central del Mashíaj. Así como Adonái prometió a Nóaj que nunca más habría un diluvio para destruir la tierra, el pacto con el Mashíaj promete una redención inmutable y total. Yeshúa haMashíaj es el cumplimiento de este pacto davídico eterno, Aquel a quien las naciones buscarán (Yeshayáhu 55:5). El juicio del diluvio fue físico, pero la redención mesiánica es espiritual, ofreciendo “agua” a los sedientos y “leche y miel” sin costo (Yeshayáhu 55:1), un símbolo de la Toráh y la vida espiritual que Yeshúa ofrece gratuitamente por medio de Su sacrificio. La renovación de la tierra después del diluvio apunta a la futura renovación del mundo bajo el gobierno de Mashíaj, donde la naturaleza misma será transformada para reflejar Su gloria (Yeshayáhu 55:13, “en lugar de la zarza crecerá el ciprés”).
Aplicación Espiritual:
La Haftaráh nos recuerda que, a pesar de los juicios pasados y los que están por venir, la Misericordia de Adonái es la última palabra. Para los creyentes en la actualidad, la Haftaráh es una exhortación a vivir en la esperanza de la redención mesiánica. Adonái desea que el perverso (רָשָׁע – Ra-shá) deje su camino y regrese (Teshuváh). La historia de Nóaj es una sombra (Tzelalím) de la salvación por la fe y la obediencia en medio de la corrupción; la Haftaráh es la promesa de la restauración de la Casa de Yisrael y, por ende, del mundo. Nuestra aplicación es buscar activamente a Adonái a través de Yeshúa haMashíaj, quien es el Pacto Eterno manifestado. Debemos alejarnos de nuestros pensamientos de iniquidad y vivir de acuerdo con los caminos de Adonái, sabiendo que Su palabra, como la lluvia que riega la tierra (Yeshayáhu 55:10-11), no regresa vacía, sino que cumple Su propósito redentor en nosotros y en el mundo venidero.
Punto 3. Brit Hadasháh
Brit Hadasháh: Ivrim (Hebreos) 11:7
Texto Interlineal Anotado Arameo-Español en Formato
| Texto Arameo (Peshitta) | Fonética (Siríaca Oriental) | Traducción Palabra por Palabra |
| Ivrim 11:7 | ||
| ܒܗܝܡܢܘܬܐ | B’hay-man-u-tha | Por (o en) fe |
| ܢܘܚ | Nohh | Nóaj |
| ܐܬܟܫܦ | Eth-kash-shaph | fue advertido |
| ܥܠ | ‘Al | sobre |
| ܕܠܐ | D’lo | lo que no |
| ܡܬܚܙܐ | Meth-hza | se veía |
| ܘܒܬܚܘܡܬܗ | W’veth-húm-theh | y por su temor |
| ܥܒܕ | ‘Avad | hizo |
| ܠܗ | Leh | para sí |
| ܩܝܒܘܬܐ | Qey-bú-tha | un arca |
| ܠܚܝܝ | L’hayyéy | para la vida de |
| ܒܝܬܗ | Bay-theh | su casa |
| ܘܒܗ | W’veh | y por ella |
| ܡܚܝܒ | M’hayyav | condenó |
| ܠܥܠܡܐ | L’alma | al mundo |
| ܘܠܙܕܝܩܘܬܐ | W’l’zad-dī-qú-tha | y la justicia |
| ܕܒܗܝܡܢܘܬܐ | D’vhay-man-u-tha | que por fe |
| ܗܘܐ | Hwā | llegó a ser |
| ܝܪܬܐ | Yár-tha | heredero |
Comentarios:
Este único versículo en Ivrim 11:7 destila la esencia de la Aliyáh de Nóaj y la Parasháh completa: la fe (B’haymanutha) como el motor de la obediencia en respuesta a la advertencia divina sobre un juicio invisible. El texto arameo Peshitta utiliza la palabra ܐܬܟܫܦ (Eth-kash-shaph), que significa fue advertido, fue suplicado o fue rogado, resaltando la íntima comunicación entre Adonái y Nóaj. Nóaj fue movido no por lo que veían sus ojos, sino por lo que no se veía (ܕܠܐ ܡܬܚܙܐ – D’lo Meth-hza), un principio fundamental de la fe.
La acción de Nóaj fue ܥܒܕ ܠܗ ܩܝܒܘܬܐ (Avad Leh Qeybútha), hizo para sí un arca. El arca (Te-váh en hebreo, Qeybútha en arameo) es el símbolo central de la salvación provista por Adonái. El acto de obediencia, que duró décadas y lo expuso al escarnio público, se convierte en el estándar de la justicia. La culminación es que Nóaj (ܡܚܝܒ ܠܥܠܡܐ – M’hayyav L’alma, condenó al mundo) y (ܠܙܕܝܩܘܬܐ ܕܒܗܝܡܢܘܬܐ ܗܘܐ ܝܪܬܐ – W’l’zad-dī-qú-tha D’vhaymanutha Hwā Yártha, y la justicia que por fe llegó a ser heredero). El arca sirvió de prueba contra la incredulidad y la iniquidad de su generación.
Conexión con la Toráh y Haftaráh:
- Toráh (Bereshit 7:17-8:14): La Toráh nos da los detalles del arca flotando, la destrucción universal, el recuerdo de Elohím a Nóaj (8:1) y el proceso de secado de la tierra, culminando con la paloma y la hoja de olivo (8:11). El Brit Hadasháh resume toda esta narrativa diciendo que el arca fue el resultado de la fe de Nóaj. La fe no es pasiva, sino que se manifiesta en la obediencia radical de construir un objeto de salvación para la vida (ܠܚܝܝ ܒܝܬܗ – L’hayyéy Baytheh) de su casa. Nóaj experimentó el recuerdo de Elohím (8:1), el punto de inflexión donde el juicio cesa y la gracia actúa.
- Haftaráh (Yeshayáhu 55:6-13): La Haftaráh llama a buscar a Adonái y al arrepentimiento (Teshuváh). Ivrim 11:7 muestra que Nóaj, al ser advertido, actuó en Teshuváh y fe, demostrando que volver a Adonái se traduce en acción. La obediencia de Nóaj es el modelo de la Teshuváh que resulta en una promesa de vida, el mismo principio de vida eterna ofrecido en la Haftaráh a través del Pacto Eterno.
Reflexión Mesiánica:
El Brit Hadasháh establece a Yeshúa haMashíaj como el centro de esta narrativa. Nóaj y su arca son la Tipología (Tipo) más clara de la salvación mesiánica. Yeshúa es la verdadera Te-váh (Arca) de la salvación. Así como solo había un camino de escape del juicio de las aguas (Mei Nóaj – Aguas de Nóaj), solo hay un camino para escapar del juicio venidero: Yeshúa haMashíaj.
El concepto de la Deidad de Yeshúa se refuerza en el paralelismo: Nóaj fue advertido por Elohím (Bereshit 7:1); el Brit Hadasháh afirma que Yeshúa es el Hijo de Elohím a través de quien Adonái nos ha hablado en estos últimos días (Ivrim 1:1-3), y que es MarYah (el Señor) en el texto arameo, cumpliendo la profecía del Pacto Eterno de Yeshayáhu 55:3-5. Yeshúa es el que trae la verdadera justicia (ܙܕܝܩܘܬܐ – Zad-dī-qú-tha) a través de la fe (ܒܗܝܡܢܘܬܐ – B’haymanutha), haciéndonos coherederos de la promesa, al igual que Nóaj se hizo heredero de la justicia por su fe. La fe de Nóaj fue en la Palabra de Elohím que advirtió; nuestra fe es en la Palabra Encarnada, Yeshúa, quien es Adonái manifestado en carne. Nóaj trae consigo la Ruaj Hakodesh (el espíritu/viento) para secar las aguas (Bereshit 8:1), lo cual es una alusión profética del Consolador prometido por Yeshúa para la era del Brit Hadasháh. Nóaj, al salvar a su casa, condena al mundo; Yeshúa, al morir en el Madero y resucitar, salva a Su Kahal (Comunidad) y ofrece el testimonio final de condenación al mundo que lo rechazó.
Punto 4. Contexto Histórico y Cultural
La narrativa de Nóaj y el Diluvio se encuentra en un contexto histórico y cultural que abarca desde la prehistoria bíblica hasta los ecos en el periodo del Segundo Templo y los escritos mesiánicos.
Contexto Cultural, Geográfico e Histórico:
- El Periodo del Diluvio: El relato se sitúa en un periodo antediluviano, caracterizado por la “corrupción” (שַׁחַת – Shá-jat) de toda carne, que el texto bíblico describe como la prevalencia de la violencia (חָמָס – Jamás) sobre la tierra. Arqueológicamente, si bien no existe un hallazgo que confirme el relato universal del Diluvio de la Toráh, la existencia de narrativas de grandes inundaciones es un fenómeno global (Mesopotamia, América, etc.), siendo la más famosa la Epopeya de Gilgamesh, que narra la historia de Utnapishtim, quien construye un barco por orden divina para sobrevivir a una inundación. El texto de Bereshit, sin embargo, se distingue por su enfoque monoteísta y moral: el Diluvio no es un capricho de los dioses, sino el juicio justo de un solo Elohím contra la maldad ética y moral del ser humano.
- El Mishkán (Tabernáculo) y el Templo: La Aliyáh de Nóaj, que culmina con la salida del arca (un refugio temporario), es un anticipo del concepto del Mishkán. Así como el arca fue la morada de la presencia de Elohím en medio de un mundo destruido, el Mishkán y posteriormente el Templo (Primer y Segundo) fueron los lugares de la Shejináh (Presencia Divina) en medio de un pueblo. El principio de Elohím recordando a Nóaj (Bereshit 8:1) es la base para la liturgia del Templo y el concepto de la expiación, donde Adonái recuerda Su pacto con Su pueblo.
- Qumrán y Escritos Nazarenos: Los manuscritos de Qumrán (Rollos del Mar Muerto) contienen material apócrifo relacionado con Nóaj, como el Libro de las Luminarias o el Génesis Apócrifo, que expanden la narrativa de la Parasháh. Estos textos reflejan el interés en la justificación de Nóaj y el simbolismo del arca como salvación para un remanente fiel. En los escritos mesiánicos y nazarenos de los primeros siglos, el arca de Nóaj fue vista como un tipo de la Kehiláh (Comunidad) o del propio Mashíaj. Por ejemplo, la frase “ocho almas se salvaron por agua” (1 Kefa 3:20) establece el paralelo explícito entre el arca y la salvación provista por Yeshúa a través de la Tevilah (Inmersión) en el Nuevo Pacto.
Textos Fuente y Comentarios Profundos:
- Las 7 Aliyot (Génesis 7:17-8:14):
- Juicio y Aniquilación (7:17-24): Se subraya la magnitud total del juicio (מְאֹד מְאֹד – Me-ód Me-ód, en gran manera, en gran manera – 7:19), cubriendo las montañas y aniquilando todo aliento de vida (נִשְׁמַת רוּחַ חַיִּים – Nishmát Rúaj Ja-yím – 7:22). El Targum de Onkelos traduce הַיְקוּם (ha-ye-kúm) (7:23, la existencia) como los que estaban de pie, implicando que solo aquellos que se levantaron contra Adonái fueron destruidos, una interpretación que busca suavizar la universalidad para mantener la justicia divina.
- El Recuerdo Divino y el Cese (8:1-5): El verso clave es וַיִּזְכֹּר אֱלֹהִים אֶת־ נֹחַ (Va-yiz-kór Elohím et Nóaj), Y recordó Elohím a Nóaj. En hebreo, recordar no es solo traer a la mente, sino actuar en función de un pacto. Este acto de “recordar” es la intervención activa de la gracia que detiene el juicio, simbolizado por el viento/espíritu (רוּחַ – Rúaj) que Elohím hace pasar sobre la tierra y el cierre de las fuentes del abismo.
- La Exploración y la Señal de Esperanza (8:6-14): El uso del cuervo (עֹרֵב – O-rév) y la paloma (יוֹנָה – Yo-náh) es altamente simbólico. El cuervo, un ave impura que se alimenta de carroña, no regresa. La paloma, un ave pura y pacífica, que regresa sin reposo, y luego con la hoja de olivo (עֲלֵה זַיִת – A-léh Zá-yit), es la señal de la nueva creación, el retorno de la vida y la disminución de las aguas. Nóaj actuando por etapas y esperando siete días (שִׁבְעַת יָמִים – Shiv’át Ya-mím) adicionales antes de enviar la paloma por tercera vez, enfatiza la paciencia y el patrón divino de la semana (Shabát).
Punto 5. Estudio, comentarios y conexiones proféticas
Comentarios Rabínicos:
Los Rabinos se enfocan en la importancia de וַיִּזְכֹּר אֱלֹהִים אֶת־ נֹחַ (8:1).
- Rashí (Rabí Shlomó Yitzjakí), comentando el versículo 8:1, enfatiza que el recuerdo de Elohím no fue solo para Nóaj, sino también para los animales puros que estaban con él, un acto de misericordia que trasciende al hombre. Él ve en la disminución de las aguas una midáh kenégued midáh (medida por medida), donde la detención de las lluvias y el cierre de las fuentes fue un proceso deliberado de sanación de la tierra.
- Nejamías en el Talmud (Sanhedrín 108b) debate si Nóaj creyó verdaderamente hasta que las aguas subieron y lo obligaron a entrar, lo que resalta la tensión entre la fe de Nóaj y la magnitud del evento, algo que el Brit Hadasháh luego resuelve a su favor (Ivrim 11:7).
- El Midrash Tanjumá profundiza en la acción de la paloma, indicando que la hoja de olivo fue un regalo, pero también un mensaje de que la Tierra de Yisrael, incluso después de ser sumergida, sigue siendo la más fructífera y la primera en reverdecer.
Comentario Judío Mesiánico:
La narrativa es una rica fuente de cumplimiento profético en Yeshúa haMashíaj.
- La Te-váh (Arca): El arca es el refugio de salvación, la única puerta de entrada a la vida. Yeshúa se presenta a Sí Mismo como la puerta única (Yojanán/Juan 10:9). Así como Nóaj se salvó por entrar a la arca por mandato divino, la humanidad se salva por entrar en Yeshúa por medio de la fe obediente.
- El Recuerdo (Va-yiz-kór): El recuerdo de Elohím a Nóaj (8:1) es la garantía de que el juicio tiene un límite y que Su pacto prevalece. Este “recuerdo” halla su máxima expresión en Yeshúa, quien en la última cena, al establecer el Nuevo Pacto, ordena “Haced esto en recuerdo mío” (Lucas 22:19), vinculando Su sacrificio con la activación de la gracia divina en favor de Su pueblo.
- El Ruaj (Viento/Espíritu): Elohím hace pasar un Ruaj (8:1) para secar la tierra. Este Ruaj Hakodesh es la fuerza de la nueva creación y la renovación. Proféticamente, el Ruaj Hakodesh es derramado por Yeshúa haMashíaj para inaugurar el Nuevo Pacto y hacer nacer de nuevo a Sus seguidores, secando las “aguas” del juicio y la muerte en sus vidas.
Notas de los Primeros Siglos:
Los creyentes nazarenos tempranos vieron en Nóaj un Tipo de Yeshúa. Nóaj es el “justo” que salva a su casa.
- El texto de Kefa (Pedro) establece el paralelismo directo: “La paciencia de Elohím esperaba en los días de Nóaj, mientras se preparaba el arca, en la cual pocas personas, es decir, ocho, fueron salvadas por agua. La Tevilah (Inmersión) que corresponde a esto ahora nos salva a nosotros (no quitando la suciedad de la carne, sino como el compromiso de una buena conciencia hacia Elohím), por la resurrección de Yeshúa haMashíaj” (1 Kefa 3:20-21). Esta conexión resalta el significado redentor del agua: el agua que trajo juicio para el mundo, trajo salvación para Nóaj, y el agua de la Tevilah es un acto de muerte al viejo mundo de pecado y resurrección a la nueva vida en Yeshúa.
Anotaciones Gramaticales, Léxicas y Guematría:
- Léxico: La palabra תֵּבָה (Te-váh – Arca) solo se usa para el arca de Nóaj y la canasta de Moshéh (Moisés). Ambas estructuras son de salvación y contención, y ambas flotan en el agua del juicio, siendo un patrón redentor.
- Gramática: El verbo וַיִּזְכֹּר (Va-yiz-kór – Y recordó) es un Vav consecutivo en Qal imperfecto, lo que subraya que la acción de Elohím es la continuación lógica de un pacto anterior. No es que Elohím se olvidó y luego se acordó, sino que Su tiempo de juicio había terminado, y Su tiempo de gracia, prometido, llegó.
- Guematría: El Diluvio duró 150 días de la prevalencia de las aguas (7:24), y 150 días después de que las aguas cesaron, el arca reposó (8:3-4). Nóaj tenía 600 años (600: ר) y 1 año y 11 días (1: א; 11: יא) al salir del arca (8:13-14). El número 7 (siete días de espera) es omnipresente, asociado a la perfección y la plenitud de Elohím. La palabra יוֹנָה (Yo-náh – Paloma) tiene una Guematría de 71 (י=10, ו=6, נ=50, ה=5).
Punto 6. Análisis Profundo de la Aliyáh
La Aliyáh 3 es el clímax y el punto de inflexión de la narrativa del Diluvio. Comienza con la descripción gráfica y expansiva de la aniquilación total de la vida fuera del arca (7:17-23) y culmina con la primera señal de vida de la tierra (la hoja de olivo, 8:11).
Análisis y Comentario Judío y Mesiánico:
- El Juicio Completo (7:17-23): La repetición de frases como מְאֹד מְאֹד (Me-ód Me-ód) y la lista de todos los seres vivientes (ave, ganado, reptil, hombre) enfatizan la perfección y finalidad del juicio de Elohím. Esto refuta cualquier noción de un diluvio meramente local. El juicio fue global para la generación de Nóaj. El comentario mesiánico subraya que esta destrucción es el presagio del juicio final del mundo, del cual Yeshúa nos advirtió (Matityáhu 24:37-39).
- La Soberanía de Elohím (8:1): El versículo “Y recordó Elohím a Nóaj” es la afirmación de la soberanía de Adonái sobre la naturaleza y el destino humano. El diluvio no fue un evento sin control; fue una acción iniciada y terminada por Elohím. La agencia del viento (רוּחַ) para apaciguar las aguas es fundamental. Judío mesiánicamente, esto apunta a Yeshúa como la encarnación de la sabiduría y el poder de Adonái, quien tiene autoridad sobre el viento y el mar, y cuyo Ruaj Hakodesh es el agente de la nueva creación y paz.
- Patrón de Redención: Cuervo y Paloma: El cuervo, que no regresa, representa la incapacidad de la Toráh (que trae conocimiento del pecado, Ro 3:20) de llevar a la tierra de la redención. La paloma, en contraste, es la portadora de la señal de la gracia y la paz. En el Brit Hadasháh, el Ruaj Hakodesh desciende sobre Yeshúa en forma de paloma (Matityáhu 3:16), simbolizando la Nueva Alianza de paz que Yeshúa inaugura, marcando el fin de la ira y el comienzo de la restauración. La hoja de olivo (זַיִת – Zá-yit) es el símbolo de la unción y la plenitud.
Punto 7. Tema Más Relevante de la Aliyáh
El tema central de la Aliyáh 3 es: La Misericordia del Juicio y el Comienzo de la Nueva Creación por la Gracia Soberana de Elohím.
Este tema es vital en el contexto de la Toráh porque:
- Establece el precedente de que el juicio de Adonái es perfecto y justo, pero nunca es el final.
- Introduce el concepto crucial de Va-yiz-kór Elohím (Y recordó Elohím) (8:1), el mecanismo por el cual Adonái interrumpe el juicio en base a Su pacto.
- Establece el patrón de la Teshuváh (Retorno) y la esperanza, a través de la secuencia de la paloma y la hoja de olivo, confirmando que la vida prevalece sobre la muerte.
Relación con las Enseñanzas de Yeshúa:
- Continuidad de la Toráh y el Brit Hadasháh: Yeshúa afirmó que los días de Nóaj son un espejo de Su segunda venida (Matityáhu 24:37-39). Así como el juicio vino inesperadamente a aquellos que vivían en la complacencia, el retorno de Yeshúa será un evento que sorprenderá al mundo. La fe de Nóaj, manifestada en su obediencia a construir el arca, es el mismo tipo de fe y obediencia que Yeshúa pide a Su Kahal para estar preparados para Su regreso.
Conexión Temática con los Moedim de Elohím (Fiestas de Adonái):
Esta Aliyáh se conecta profundamente con Shavu’ót y Sucót.
- Shavu’ót (Semanas): Nóaj espera dos períodos de siete días (8:10, 8:12) después de enviar la paloma. El número siete y la espera de las semanas es la base de Shavu’ót, que marca la culminación de la espera (la cuenta del Omer) y el descenso del Ruaj Hakodesh. El Ruaj que seca la tierra (8:1) es un tipo del Ruaj Hakodesh que fue dado en Shavu’ót (Hechos 2), iniciando la nueva creación en los corazones de los creyentes.
- Sucót (Cabañas): Nóaj y su familia vivieron en el arca, una morada temporaria, durante un año y diez días. El arca es una Sucáh (Cabaña) a gran escala, un refugio en el juicio. Sucót es la fiesta del regocijo por la cosecha y la morada de Elohím con Su pueblo. Yeshúa mismo es el Sucáh de Adonái, la morada segura y el refugio del juicio (Yojanán 1:14).
Punto 8. Descubriendo a Mashíaj en cada Aliyah
Profecías Mesiánicas y Reflexión:
La Aliyáh 3 es esencialmente una Tipología Mesiánica del juicio y la redención. El pasaje apunta al Mashíaj como la fuente de la única salvación.
Métodos para Descubrir al Mashíaj:
- Tipos (Tipologías):
- El Arca (Te-váh): Es el Tipo más obvio. Como el único lugar de salvación, tipifica a Yeshúa haMashíaj, el único nombre por el cual la humanidad puede ser salva.
- Nóaj: Un “justo” (Tzaddiq) que intercede y trae salvación a su casa. Él es un Tipo de Yeshúa, el Tzaddiq perfecto que trae salvación a toda la Kehiláh por Su justicia.
- Sombras (Tzelalim):
- El Recuerdo de Elohím (Va-yiz-kór): La intervención divina en el juicio es la sombra de la gracia que se manifestaría plenamente en Yeshúa. Adonái interrumpe la destrucción debido a un “justo”; en el Brit Hadasháh, Adonái perdona completamente al pecador a causa del “Justo” perfecto, Yeshúa.
- Figuras/Patrones Redentores (Tavnitot):
- El Viento (Ruaj) y el Descenso a la Tierra Seca: El Ruaj (8:1) que seca las aguas es un patrón redentor de la obra del Ruaj Hakodesh. En la Tevilah de Yeshúa, el Ruaj Hakodesh desciende como una paloma, simbolizando el inicio de la nueva era de paz y la nueva creación, haciendo referencia directa a la paloma de Nóaj.
- Eventos Simbólicos:
- La Hoja de Olivo: Símbolo de paz y retorno a la vida en la tierra. En la tradición mesiánica, es el símbolo de la reconciliación entre Elohím y la humanidad, completada en Yeshúa, el Príncipe de Paz.
Cumplimiento en el Brit Hadasháh:
- El Brit Hadasháh (1 Kefa 3:20-21) conecta el cruce de Nóaj a través del agua a la Tevilah del creyente. Esta Tevilah no es solo un rito de purificación, sino la identificación con la muerte y resurrección de Yeshúa. Al igual que Nóaj murió al viejo mundo de maldad y fue resucitado a la nueva creación sobre tierra firme, el creyente muere al pecado e iniquidad y es resucitado a una vida nueva con Yeshúa haMashíaj. Yeshúa es el Ejad (Uno) de Elohím, a través del cual la nueva creación es posible.
Punto 9. Midrashim, Targumim, Textos Fuentes y Apócrifos
Midrashim Relevantes (Bereshit Rabbá):
- El Midrash Bereshit Rabbá 33:7 (sobre 8:1) enseña que Nóaj temía que Elohím no lo sacara del arca, por lo que Adonái “recordó” a Nóaj. Esto resalta que incluso el justo necesita la intervención de la gracia de Elohím.
- Sobre la paloma y la hoja de olivo (8:11), el Midrash (Bereshit Rabbá 33:10) tiene un diálogo fascinante: la paloma dice: “Prefiero la comida amarga provista por Adonái (la hoja de olivo) a los manjares y lujos proporcionados por la humanidad (el arca)”. Esto eleva el simbolismo de la hoja de olivo como la elección de la fidelidad y la subsistencia provista por Elohím sobre la comodidad mundana.
Targumim (Traducciones y Paráfrasis Arameas):
- Targum Onkelos (Bereshit 8:1): “Y hubo un recuerdo favorable (וַהְוָה דְּכִיר – Va-havah Dejir) de Elohím de Nóaj…” El Targum utiliza una paráfrasis que enfatiza la naturaleza favorable de la memoria de Elohím, y que esta memoria es en el contexto de Su pacto, no un mero recuerdo.
- Targum Yerushalmí (Bereshit 7:23): Este Targum enfatiza que el exterminio fue total, “borró a todos los que estaban en pie” (יְקוּמָא), una vez más enfocándose en que la destrucción fue por causa del acto de rebelión y corrupción.
Textos Apócrifos (No Cabalá):
- Libro de Enoc (1 Enoc 65-67): Se presenta una versión más mística del diluvio. Nóaj recibe una visión profética de la destrucción. La narrativa enfatiza la maldad de los Nephilim y los ángeles caídos como la causa principal, lo que subraya la justificación de la acción de Elohím.
- Libro de los Jubileos (Jubileos 5:21-32): Este texto apócrifo da fechas más precisas y detalla el proceso del diluvio, sincronizando el evento con el calendario celestial y destacando la importancia del calendario en el plan de Elohím. También aclara que los animales salvajes fueron incluidos en el arca para preservar a la creación, no solo al hombre.
Punto 10. Mandamientos Encontrados o Principios y Valores
La Aliyáh 3 no contiene Mitzvot (Mandamientos) formales, pero está saturada de Principios y Valores fundamentales que se entienden y aplican en el contexto del Brit Hadasháh.
- Principio de la Obediencia a la Advertencia Divina (Bereshit 7:17-24, implícito): Nóaj actuó en obediencia a una advertencia sobre algo invisible.
- Aplicación Mesiánica: La fe (B’haymanutha) se manifiesta en la obediencia radical. Yeshúa haMashíaj es la Toráh Viviente (Yojanán 1:1, 14). Obedecer a Yeshúa es el único camino para la salvación. En el Brit Hadasháh, la advertencia es el llamado de Yeshúa a la Teshuváh para escapar del juicio venidero (Matityáhu 3:7).
- Valor del Recuerdo y el Pacto Divino (Bereshit 8:1): El Va-yiz-kór Elohím establece que Adonái honra Sus compromisos incluso en medio del juicio.
- Aplicación Mesiánica: Este valor es la base de la esperanza en el Nuevo Pacto. La sangre de Yeshúa es el sello del pacto que garantiza que Adonái recordará nuestras iniquidades (Ivrim 8:12) y nos salvará. El recuerdo de Adonái es ahora por medio del sacrificio de Yeshúa.
- Valor de la Paciencia y la Confianza (Bereshit 8:6-12): Nóaj espera dos períodos de siete días después del primer envío de la paloma. Su paciencia es un acto de fe activa.
- Aplicación Mesiánica: La vida en Mashíaj es una vida de espera paciente por el cumplimiento de las promesas de Adonái. Yeshúa anima a Su Kahal a perseverar en la fe, al igual que Nóaj esperó la señal de la tierra seca.
Punto 11. Preguntas de Reflexión
- ¿De qué manera el “recuerdo” de Elohím a Nóaj (8:1) cambia nuestra percepción de un Adonái de solo juicio, y cómo este acto tipifica la intervención de Yeshúa haMashíaj para detener el juicio divino sobre nosotros?
- El arca es un símbolo de la salvación por obediencia a una advertencia “invisible”. ¿Qué advertencias de juicio, a través de la boca de Yeshúa y Sus emisarios, estamos llamados a obedecer y a actuar hoy para “hacer un arca” para nuestra casa o Kehiláh?
- Reflexione sobre el simbolismo del cuervo (ave impura que no regresa) versus la paloma (ave pura que trae la hoja de olivo). ¿Cómo representa este patrón el contraste entre la Toráh que revela el pecado y el Ruaj Hakodesh que nos da la señal de la gracia y la paz en Yeshúa?
- Si Nóaj condenó a su mundo por su fe y obediencia (Ivrim 11:7), ¿qué significa para el creyente mesiánico moderno que su vida de fe y obediencia debe servir como testimonio y, por lo tanto, un “juicio” para el mundo que no cree?
- El Diluvio fue el fin de una era y el comienzo de la nueva creación. ¿Cómo la Tevilah en Yeshúa funciona como nuestro “diluvio personal”, simbolizando nuestra muerte al “viejo mundo” de pecado y nuestra resurrección a la nueva vida en Mashíaj?
Punto 12. Resumen de la Aliyáh
La Aliyáh 3 (Bereshit 7:17-8:14) relata el cénit del juicio del Diluvio y la subsiguiente transición a la nueva creación. El juicio es universal y total, exterminando a toda vida fuera del arca. El punto de inflexión ocurre en 8:1: וַיִּזְכֹּר אֱלֹהִים אֶת־ נֹחַ (Va-yiz-kór Elohím et Nóaj), donde la misericordia soberana de Adonái interviene activamente enviando un Ruaj (viento/espíritu) para apaciguar las aguas y detener la lluvia. Nóaj, por fe, emplea al cuervo y a la paloma, siendo esta última la que regresa con la hoja de olivo, la señal de la paz y la vida renovada. El proceso termina después de un año y diez días, con la tierra completamente seca. Este pasaje es la sombra de Yeshúa haMashíaj: Él es la Te-váh de salvación, el Ruaj Hakodesh que trae la nueva vida, y el Cordero de Pésaj cuyo sacrificio es el acto de “recuerdo” por parte de Adonái que pone fin al juicio sobre el creyente y lo introduce en la era de la paz y la nueva creación.
Punto 13. Tefiláh de la Aliyáh
Tefiláh (Oración) de la Aliyáh 3:
Adonái יהוה Elohím Alef Tav, fuente de toda misericordia y justicia, Te damos gracias porque aun en el tiempo de Tu más perfecto juicio, Tú eres Ejad, fiel a Tu pacto. Tú recordaste (Va-yiz-kór) a Nóaj en el arca; hoy, en el mérito de Yeshúa haMashíaj, nuestra Te-váh y único refugio, te pedimos que nos recuerdes en Tu gracia. Envía Tu Ruaj Hakodesh, como el viento que apaciguó las aguas, para calmar las tormentas de juicio y pecado en nuestras vidas. Que nuestra fe se manifieste en obediencia, al igual que la fe de Nóaj, para que seamos hallados justos en Tus ojos. Que la hoja de olivo, símbolo de paz y nueva vida, sea la certeza de Tu promesa en nuestros corazones. Llévanos con paciencia a tierra firme en Ti, para que nuestra vida sea un testimonio de Tu poder para salvar y de Tu promesa de la nueva creación que viene con Mashíaj. Amén.
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