Gén 27:28 – 28:4
Oseas 12:13-14:9 (La Redención y el Retorno de Yaakov)
Juan 1:47-51 (Yeshúa, el Descendiente de Yaakov)
¡Shalom y Bendiciones!
La verdad, me parece fascinante que estemos a punto de zambullirnos en una porción tan rica de la Toráh, la Haftaráh y el Brit Hadasháh. Para mí, esto no es solo un estudio bíblico; es una inmersión en el Reino de Yeshúa haMashíaj, que es, en esencia, la manifestación de la soberanía de Adonái Elohím sobre toda la creación, prometida desde Bereshit y consumada en la persona de nuestro Mesías.
Este Reino, que muchos entienden mal como un evento puramente futuro, está aquí y ahora, transformando vidas a través del Nuevo Pacto. Yeshúa, el Verbo hecho carne, es el Rey, el Sumo Cohén (Sacerdote), y la Toráh Viviente. Todo lo que estudiamos en la Toráh, en los Profetas, y en los Escritos (el Tanakh), apunta directamente a Él. Este estudio de la Parashá Toldot (Generaciones) nos va a revelar cómo las bendiciones de nuestros Patriarcas, a pesar de las debilidades humanas, nunca estuvieron en peligro de fallar, porque el plan de redención del Eterno se mantiene Ejad (Uno) y firme en Mashíaj. Nuestro objetivo aquí es trazar esa línea inquebrantable que une a Avraham, Yitzjak, Ya’akov y, finalmente, a Yeshúa.
1. Bereshit – Gén 27:28 – 28:4
Esta porción de la Toráh registra la culminación del drama de la bendición de Yitzjak, y la transición del pacto hacia Ya’akov, un evento lleno de intriga humana pero orquestado divinamente.
| Texto Hebreo (Tiberiana) | Palabras y Fonética | Traducción Palabra por Palabra |
| וְיִתֶּן | Ve-yi-tén | Y-que-dé |
| לְךָ | Le-khá | a-ti |
| הָאֱלֹהִים | Ha-’Elohím | El-Elohím |
| מִטַּל | Mi-ṭal | de-el-rocío-de |
| הַשָּׁמַיִם | Ha-shā-má-yim | los-cielos |
| וּמִשְׁמַנֵּי | U-mish-ma-néi | y-de-las-grosuras-de |
| הָאָרֶץ | Hā-’Ā-retz | la-tierra |
| וְרֹב | Ve-rōv | y-abundancia-de |
| דָּגָן | Dā-gān | grano |
| וְתִירֹשׁ | Ve-ṯî-rōsh | y-vino-nuevo |
| (27:28) | ||
| יַעַבְדוּךָ | Ya-‘av-dú-khā | Te-servirán |
| עַמִּים | ‘Am-mîm | pueblos |
| וְיִשְׁתַּחֲווּ | Ve-yish-ta-kha-vú | y-se-postrarán |
| לְךָ | Le-khā | a-ti |
| לְאֻמִּים | Le-’um-mîm | naciones |
| הֱוֵה | He-vēh | Sé |
| גְבִיר | Gevîr | señor |
| לְאַחֶיךָ | Le-’a-jé-khā | a-tus-hermanos |
| וְיִשְׁתַּחֲווּ | Ve-yish-ta-kha-vú | y-se-postrarán |
| לְךָ | Le-khā | a-ti |
| בְּנֵי | Be-nēy | los-hijos-de |
| אִמֶּךָ | ’Im-me-khā | tu-madre |
| אֹרְרֶיךָ | ’Or-re-ré-khā | Quienes-te-maldigan |
| אָּרוּר | ’Ā-rūr | sean-malditos |
| וּמְבָרְכֶיךָ | U-me-vā-re-khé-khā | y-quienes-te-bendigan |
| בָּרוּךְ | Bā-rūkh | sean-benditos |
| (27:29) | ||
| וַיְהִי | Va-ye-hí | Y-fue |
| כַּאֲשֶׁר | Ka-’a-shér | cuando |
| כִּלָּה | Ki-lláh | terminó |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| לְבָרֵךְ | Le-vā-rékh | de-bendecir |
| אֶת־יַעֲקֹב | ’Et-Ya-‘ă-qōv | a-Ya’akov |
| וַיְהִי | Va-ye-hí | y-fue |
| אַךְ | ’Aḵ | justo |
| יָצֹא | Yā-tzō’ | él-saliendo |
| יָצָא | Yā-tzā’ | él-salió |
| מֵאֵת | Mē-’ēṯ | de-la-presencia-de |
| פְּנֵי | Pe-nēy | el-rostro-de |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| אָבִיו | ’Ā-vîv | su-padre |
| וְעֵשָׂו | Ve-‘Ē-śāw | y-Esav |
| אָחִיו | ’Ā-jîv | su-hermano |
| בָּא | Bā’ | vino |
| מִצֵּידוֹ | Mi-tzē-dōw | de-su-caza |
| (27:30) | ||
| וַיַּעַשׂ | Va-yya-‘aś | Y-él-hizo |
| גַּם־הוּא | Gam-hū’ | también-él |
| מַטְעַמִּים | Maṭ-‘am-mîm | manjares |
| וַיָּבֵא | Va-yyā-vē’ | y-él-trajo |
| לְאָבִיו | Le-’ā-vîv | a-su-padre |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| לְאָבִיו | Le-’ā-vîv | a-su-padre |
| יָקֻם | Yā-qum | Que-se-levante |
| אָבִי | ’Ā-vî | mi-padre |
| וְיֹאכַל | Ve-yō-ḵal | y-que-coma |
| מִצֵּיד | Mi-tzēd | de-la-caza-de |
| בְּנוֹ | Be-nōw | su-hijo |
| בַּעֲבוּר | Ba-‘ă-vūr | por-causa-de |
| תְּבָרְכֵנִי | Te-vā-re-ḵē-nî | que-me-bendigas |
| נַפְשֶׁךָ | Naf-shé-khā | tu-alma |
| (27:31) | ||
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | Y-él-dijo |
| לוֹ | Lō | a-él |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| מִי־אָתָּה | Mî-’at-táh | Quién-eres-tú |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | Y-él-dijo |
| אֲנִי | ’Ă-nî | Yo |
| בִּנְךָ | Bin-khá | tu-hijo |
| בְכֹרְךָ | Bə-ḵōr-ḵā | tu-primogénito |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| (27:32) | ||
| וַיֶּחֱרַד | Va-ye-je-rad | Y-se-estremeció |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| חֲרָדָה | Jă-rā-dáh | estremecimiento |
| גְּדֹלָה | Gedō-lāh | grande |
| עַד־מְאֹד | ‘Ad-me-’ōd | hasta-el-extremo |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| מִי | Mî | Quién |
| אֵפוֹא | ’Ê-fō’ | pues |
| הוּא | Hū’ | es-él |
| הַצָּד־צַיִד | Ha-tzād-tzá-yid | el-que-cazó-caza |
| וַיָּבֵא | Va-yyā-vē’ | y-él-trajo |
| לִי | Lî | a-mí |
| וָאֹכַל | Vā-’ō-ḵal | y-yo-comí |
| מִכֹּל | Mi-kkōl | de-todo |
| בְּטֶרֶם | Bə-ṭé-rem | antes-que |
| בֹּאֶךָ | Bō-’é-khā | tu-venida |
| וָאֲבָרְכֵהוּ | Vā-’ă-vā-re-ḵē-hū | y-yo-lo-bendije |
| גַּם־בָּרוּךְ | Gam-bā-rūḵ | también-bendito |
| יִהְיֶה | Yih-yeh | será |
| (27:33) | ||
| כִּשְׁמֹעַ | Ki-shə-mō-a‘ | Cuando-oyó |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| אֶת־דִּבְרֵי | ’Et-div-rēy | las-palabras-de |
| אָבִיו | ’Ā-vîv | su-padre |
| וַיִּצְעַק | Va-yyi-tz-‘aq | y-él-clamó |
| צְעָקָה | Tze-‘ā-qāh | un-clamor |
| גְּדֹלָה | Gedō-lāh | grande |
| וּמָרָה | U-mā-rāh | y-amargo |
| עַד־מְאֹד | ‘Ad-me-’ōd | hasta-el-extremo |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| לְאָבִיו | Le-’ā-vîv | a-su-padre |
| בָּרְכֵנִי | Bār-ḵē-nî | Bendíceme |
| גַם־אָנִי | Gam-’ā-nî | también-a-mí |
| אָבִי | ’Ā-vî | mi-padre |
| (27:34) | ||
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | Y-él-dijo |
| אָחִיךָ | ’Ā-jî-khā | Tu-hermano |
| בָּא | Bā’ | vino |
| בְמִרְמָה | Və-mir-māh | con-engaño |
| וַיִּקַּח | Va-yyi-qqaḥ | y-tomó |
| בִּרְכָתֶךָ | Bir-ḵā-ṯé-khā | tu-bendición |
| (27:35) | ||
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | Y-él-dijo |
| הַכִּי | Ha-kî | ¿Acaso |
| קָרָא | Qā-rā’ | llamó |
| שְׁמוֹ | Shə-mōw | su-nombre |
| יַעֲקֹב | Ya-‘ă-qōv | Ya’akov |
| וַיַּעְקְבֵנִי | Va-yya‘-qə-vē-nî | y-me-suplantó |
| זֶה | Zeh | esta |
| פַעֲמַיִם | Fa-‘ă-má-yim | dos-veces |
| אֶת־בְּכֹרָתִי | ’Eṯ-bə-ḵō-rā-ṯî | mi-primogenitura |
| לָקָח | Lā-qāḥ | él-tomó |
| וְהִנֵּה | Və-hin-nēh | y-he-aquí |
| עַתָּה | ‘At-tāh | ahora |
| לָקַח | Lā-qaḥ | él-tomó |
| בִּרְכָתִי | Bir-ḵā-ṯî | mi-bendición |
| וַיֹּאמַר | Va-yyō-mar | y-él-dijo |
| הֲלֹא | Hă-lō’ | ¿Acaso-no |
| אָצַלְתָּ | ’Ā-tzal-tā | has-reservado |
| לִי | Lî | para-mí |
| בְּרָכָה | Bə-rā-ḵāh | una-bendición |
| (27:36)** | ||
| וַיַּעַן | Va-yya-‘an | Y-él-respondió |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| לְעֵשָׂו | Le-‘Ē-śāw | a-Esav |
| הֵן | Hēn | He-aquí |
| גְבִיר | Gevîr | señor |
| שַׂמְתִּיו | Śam-tîv | lo-he-puesto |
| לָךְ | Lākh | para-ti |
| וְאֶת־כָּל־אֶחָיו | Ve-’eṯ-kōl-’e-jāw | y-a-todos-sus-hermanos |
| נָתַתִּי | Nā-ṯat-tî | he-dado |
| לוֹ | Lōw | a-él |
| לַעֲבָדִים | La-‘ă-vā-ḏîm | por-siervos |
| וּבְדָגָן | Ū-və-ḏā-gān | y-con-grano |
| וְתִירֹשׁ | Ve-ṯî-rōsh | y-vino-nuevo |
| סְמַכְתִּיו | Sə-maḵ-tîv | lo-he-sostenido |
| וּלְכָה | Ū-le-ḵā | y-a-ti |
| אֵפוֹא | ’Ê-fō’ | pues |
| מָה | Māh | qué |
| אֶעֱשֶׂה | ’E-‘ĕ-śeh | haré |
| בְּנִי | Bə-nî | mi-hijo |
| (27:37) | ||
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | Y-él-dijo |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| אֶל־אָבִיו | ’El-’ā-vîv | a-su-padre |
| הַבְרָכָה | Hă-və-rā-ḵāh | ¿Es-la-bendición |
| אַחַת | ’A-jaṯ | una-sola |
| הִוא | Hî’ | ella |
| לְךָ | Lākh | para-ti |
| אָבִי | ’Ā-vî | mi-padre |
| בָּרְכֵנִי | Bār-ḵē-nî | Bendíceme |
| גַם־אָנִי | Gam-’ā-nî | también-a-mí |
| אָבִי | ’Ā-vî | mi-padre |
| וַיִּשָּׂא | Va-yyiś-śā’ | Y-él-alzó |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| קֹלוֹ | Qō-lōw | su-voz |
| וַיֵּבְךְּ | Va-yyēvkh | y-él-lloró |
| (27:38) | ||
| וַיַּעַן | Va-yya-‘an | Y-él-respondió |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| אָבִיו | ’Ā-vîv | su-padre |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| לוֹ | Lōw | a-él |
| הִנֵּה | Hin-nēh | He-aquí |
| מִשְׁמַנֵּי | Mish-ma-néi | de-las-grosuras-de |
| הָאָרֶץ | Hā-’Ā-retz | la-tierra |
| יִהְיֶה | Yih-yeh | será |
| מוֹשָׁבֶךָ | Mōw-shā-vé-khā | tu-morada |
| וּמִטַּל | Ū-mi-ṭal | y-del-rocío-de |
| הַשָּׁמַיִם | Ha-shā-má-yim | los-cielos |
| מֵעָל | Mē-‘āl | de-arriba |
| (27:39) | ||
| וְעַל־חַרְבְּךָ | Ve-‘al-jăr-be-khā | Y-por-tu-espada |
| תִחְיֶה | Ti-jə-yeh | vivirás |
| וְאֶת־אָחִיךָ | Ve-’eṯ-’ā-jî-khā | y-a-tu-hermano |
| תַּעֲבֹד | Ta-‘ă-vōd | servirás |
| וְהָיָה | Ve-hā-yāh | y-será |
| כַּאֲשֶׁר | Ka-’ă-shér | cuando |
| תָּרִיד | Tā-rîḏ | te-independices |
| וּפָרַקְתָּ | Ū-fā-raq-tā | y-romperás |
| עֻלּוֹ | ‘Ul-lōw | su-yugo |
| מֵעַל | Mē-‘al | de-encima-de |
| צַוָּארֶךָ | Tza-wwā-ré-khā | tu-cuello |
| (27:40) | ||
| וַיִּשְׂטֹם | Va-yyiś-ṭōm | Y-aborreció |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| אֶת־יַעֲקֹב | ’Eṯ-Ya-‘ă-qōv | a-Ya’akov |
| עַל־הַבְּרָכָה | ‘Al-ha-bə-rā-ḵāh | a-causa-de-la-bendición |
| אֲשֶׁר | ’Ă-shér | que |
| בֵּרְכוֹ | Bēr-ḵōw | lo-bendijo |
| אָבִיו | ’Ā-vîv | su-padre |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| בְּלִבּוֹ | Bə-lib-bōw | en-su-corazón |
| יִקְרְבוּ | Yi-qə-rə-vū | Se-acercan |
| יְמֵי | Yə-mêy | los-días-de |
| אֵבֶל | ’Ē-vel | el-luto |
| אָבִי | ’Ā-vî | mi-padre |
| וְאַהַרְגָה | Ve-’ah-re-gāh | y-yo-mataré |
| אֵת | ’Ēṯ | a |
| יַעֲקֹב | Ya-‘ă-qōv | Ya’akov |
| אָחִי | ’Ā-jî | mi-hermano |
| (27:41) | ||
| וַתֻּגַּד | Va-ttu-ggad | Y-fue-dicho |
| לְרִבְקָה | Le-Riv-qāh | a-Rivqah |
| אֶת־דִּבְרֵי | ’Et-div-rēy | las-palabras-de |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| בְּנָהּ | Be-nāh | su-hijo |
| הַגָּדֹל | Ha-ggā-ḏōl | el-mayor |
| וַתִּשְׁלַח | Va-tti-shə-laḥ | y-ella-envió |
| וַתִּקְרָא | Va-tti-qə-rā’ | y-ella-llamó |
| לְיַעֲקֹב | Le-Ya-‘ă-qōv | a-Ya’akov |
| בְּנָהּ | Bə-nāh | su-hijo |
| הַקָּטָן | Ha-qqā-ṭān | el-menor |
| וַתֹּאמֶר | Va-ttō-mer | y-ella-dijo |
| אֵלָיו | ’Ê-lāyw | a-él |
| הִנֵּה | Hin-nēh | He-aquí |
| עֵשָׂו | ‘Ē-śāw | Esav |
| אָחִיךָ | ’Ā-jî-khā | tu-hermano |
| מִתְנַחֵם | Miṯ-na-jēm | se-está-consolando |
| לְךָ | Lākh | por-ti |
| לְהָרְגֶךָ | Lə-hā-re-gé-khā | para-matarte |
| (27:42) | ||
| וְעַתָּה | Ve-‘at-tāh | Y-ahora |
| בְנִי | Bə-nî | mi-hijo |
| שְׁמַע | Shə-ma‘ | escucha |
| בְּקֹלִי | Bə-qō-lî | a-mi-voz |
| וְקוּם | Wə-qūm | y-levántate |
| בְּרַח־לְךָ | Bə-raḥ-lə-khā | huye-tú |
| אֶל־לָבָן | ’El-Lā-vāan | a-Laván |
| אָחִי | ’Ā-jî | mi-hermano |
| חָרָנָה | Jā-rā-nāh | a-Jarán |
| (27:43) | ||
| וְיָשַׁבְתָּ | Ve-yā-shav-tā | Y-te-quedarás |
| עִמּוֹ | ‘Im-mōw | con-él |
| יָמִים | Yā-mîm | días |
| אֲחָדִים | ’Ă-jā-ḏîm | pocos |
| עַד | ‘Aḏ | hasta |
| אֲשֶׁר | ’Ă-shér | que |
| תָּשׁוּב | Tā-shūv | se-vuelva |
| חֲמַת | Jă-maṯ | la-ira-de |
| אָחִיךָ | ’Ā-jî-khā | tu-hermano |
| (27:44) | ||
| עַד | ‘Aḏ | Hasta |
| שׁוּב | Shūv | volverse |
| אַף | ’Af | la-furia |
| אָחִיךָ | ’Ā-jî-khā | de-tu-hermano |
| מִמֶּךָּ | Mim-mé-kkā | de-ti |
| וְשָׁכַח | Wə-shā-khaḥ | y-él-olvide |
| אֵת | ’Ēṯ | a |
| אֲשֶׁר | ’Ă-shér | lo-que |
| עָשִׂיתָ | ‘Ā-śî-ṯā | hiciste |
| לּוֹ | Llōw | a-él |
| וְשָׁלַחְתִּי | Wə-shā-laḥ-tî | y-yo-enviaré |
| וּלְקַחְתִּיךָ | Ū-lə-qaḥ-tî-khā | y-te-tomaré |
| מִשָּׁם | Mi-shshām | de-allí |
| לָמָה | Lā-māh | ¿Por-qué |
| אֶשְׁכַּל | ’Esh-kal | seré-privada |
| גַּם | Gam | también |
| שְׁנֵיכֶם | Shə-nê-khem | de-ambos-vosotros |
| יוֹם | Yōwm | un-día |
| אֶחָד | ’E-jāḏ | uno |
| (27:45) | ||
| וַתֹּאמֶר | Va-ttō-mer | Y-ella-dijo |
| רִבְקָה | Riv-qāh | Rivqah |
| אֶל־יִצְחָק | ’El-Yitz-jāq | a-Yitzjak |
| קַצְתִּי | Qatz-tî | Estoy-cansada |
| בְחַיַּי | Və-jay-yay | de-mi-vida |
| מִפְּנֵי | Mippə-nêy | a-causa-de |
| בְּנוֹת | Bə-nōwṯ | las-hijas-de |
| חֵת | Jēṯ | Jet |
| אִם־לֹקֵחַ | ’Im-lō-qē-aḥ | Si-tomando |
| יַעֲקֹב | Ya-‘ă-qōv | Ya’akov |
| אִשָּׁה | ’Ish-shāh | mujer |
| מִבְּנוֹת־חֵת | Mib-bə-nōwṯ-Jēṯ | de-las-hijas-de-Jet |
| כָּאֵלֶּה | Kā-’ē-lleh | como-estas |
| מִבְּנוֹת | Mib-bə-nōwṯ | de-las-hijas-de |
| הָאָרֶץ | Hā-’Ā-retz | la-tierra |
| לָמָּה | Lām-māh | ¿Para-qué |
| לִי | Lî | a-mí |
| חַיִּים | Jay-yîm | vida |
| (27:46) | ||
| וַיִּקְרָא | Va-yyi-qə-rā’ | Y-él-llamó |
| יִצְחָק | Yitz-jāq | Yitzjak |
| אֶל־יַעֲקֹב | ’El-Ya-‘ă-qōv | a-Ya’akov |
| וַיְבָרֶךְ | Vay-vā-rekh | y-él-lo-bendijo |
| אֹתוֹ | ’Ō-ṯōw | a-él |
| וַיְצַוֵּהוּ | Vay-tza-wē-hū | y-él-le-ordenó |
| וַיֹּאמֶר | Va-yyō-mer | y-él-dijo |
| לוֹ | Lōw | a-él |
| לֹא־תִקַּח | Lō-ṯi-qqaḥ | No-tomes |
| אִשָּׁה | ’Ish-shāh | mujer |
| מִבְּנוֹת | Mib-bə-nōwṯ | de-las-hijas-de |
| כְּנָעַן | Kə-nā-‘an | Kena’an |
| (28:1) | ||
| קוּם | Qūm | Levántate |
| לֵךְ | Lēkh | ve |
| פַּדְּנָה | Pad-de-nāh | a-Paddán |
| אֲרָם | ’Ă-rām | Aram |
| אֶל־בֵּית | ’El-Bēyṯ | a-casa-de |
| בְּתוּאֵל | Bə-ṯū-’ēl | Betu’el |
| אֲבִי | ’Ă-vî | el-padre-de |
| אִמֶּךָ | ’Im-mé-khā | tu-madre |
| וְקַח־לְךָ | Wə-qaḥ-lə-khā | y-toma-para-ti |
| מִשָּׁם | Mi-shshām | de-allí |
| אִשָּׁה | ’Ish-shāh | mujer |
| מִבְּנוֹת | Mib-bə-nōwṯ | de-las-hijas-de |
| לָבָן | Lā-vāan | Laván |
| אֲחִי | ’Ă-jî | el-hermano-de |
| אִמֶּךָ | ’Im-mé-khā | tu-madre |
| (28:2) | ||
| וְאֵל | Wə-’Ēl | Y-El |
| שַׁדַּי | Shad-day | Shadday |
| יְבָרֵךְ | Yə-vā-rēkh | te-bendiga |
| אֹתְךָ | ’Ō-ṯə-ḵā | a-ti |
| וְיַפְרְךָ | Wə-yaf-rə-ḵā | y-te-haga-fructífero |
| וְיַרְבֶּךָ | Wə-yar-bé-ḵā | y-te-multiplique |
| וְהָיִיתָ | Wə-hā-yî-ṯā | y-seas |
| לִקְהַל | Li-qə-hal | una-congregación-de |
| עַמִּים | ‘Am-mîm | pueblos |
| (28:3) | ||
| וְיִתֶּן־לְךָ | Wə-yit-ten-lə-ḵā | Y-te-dé-a-ti |
| אֶת־בִּרְכַּת | ’Eṯ-bir-kaṯ | la-bendición-de |
| אַבְרָהָם | ’Av-rā-hām | Avraham |
| לְךָ | Lə-ḵā | a-ti |
| וּלְזַרְעֲךָ | Ū-lə-zar-a-ḵā | y-a-tu-descendencia |
| אִתָּךְ | ’It-tākh | contigo |
| לְרִשְׁתְּךָ | Lā-riš-tə-ḵā | para-que-heredes |
| אֶת־אֶרֶץ | ’Eṯ-’E-retz | la-tierra-que |
| מְגֻרֶיךָ | Mə-gu-ré-khā | de-tus-moradas |
| אֲשֶׁר | ’Ă-shér | la-que |
| נָתַן | Nā-ṯan | dio |
| אֱלֹהִים | ’Elohím | Elohím |
| לְאַבְרָהָם | Lə-’Av-rā-hām | a-Avraham |
| (28:4) |
Traducción Literal al Español:
(27:28) Y que dé a ti el Elohím del rocío de los cielos y de las grosuras de la tierra, y abundancia de grano y vino nuevo. (27:29) Te servirán pueblos y se postrarán a ti naciones; sé señor a tus hermanos, y se postrarán a ti los hijos de tu madre. Quienes te maldigan sean malditos, y quienes te bendigan sean benditos. (27:30) Y fue que, cuando terminó Yitzjak de bendecir a Ya’akov, y fue justo él saliendo, él salió de la presencia del rostro de Yitzjak su padre, y Esav su hermano vino de su caza. (27:31) Y él hizo también él manjares y él trajo a su padre, y él dijo a su padre: Que se levante mi padre y que coma de la caza de su hijo, por causa de que me bendigas tu alma. (27:32) Y él dijo a él Yitzjak: ¿Quién eres tú? Y él dijo: Yo tu hijo, tu primogénito, Esav. (27:33) Y se estremeció Yitzjak un estremecimiento grande hasta el extremo, y él dijo: ¿Quién pues es él, el que cazó caza y trajo a mí, y yo comí de todo antes que tu venida, y yo lo bendije? ¡También bendito será! (27:34) Cuando oyó Esav las palabras de su padre, y él clamó un clamor grande y amargo hasta el extremo, y él dijo a su padre: ¡Bendíceme también a mí, mi padre! (27:35) Y él dijo: Tu hermano vino con engaño y tomó tu bendición. (27:36) Y él dijo: ¿Acaso llamó su nombre Ya’akov (Suplantador)? Y me suplantó esta dos veces: mi primogenitura él tomó, y he aquí, ahora él tomó mi bendición. Y él dijo: ¿Acaso no has reservado para mí una bendición? (27:37) Y él respondió Yitzjak y él dijo a Esav: He aquí, señor lo he puesto para ti, y a todos sus hermanos he dado a él por siervos, y con grano y vino nuevo lo he sostenido. Y a ti pues, ¿qué haré, mi hijo? (27:38) Y él dijo Esav a su padre: ¿Es la bendición una sola ella para ti, mi padre? ¡Bendíceme también a mí, mi padre! Y él alzó Esav su voz y él lloró. (27:39) Y él respondió Yitzjak su padre y él dijo a él: He aquí, de las grosuras de la tierra será tu morada, y del rocío de los cielos de arriba. (27:40) Y por tu espada vivirás, y a tu hermano servirás; y será cuando te independices, y romperás su yugo de encima de tu cuello. (27:41) Y aborreció Esav a Ya’akov a causa de la bendición que lo bendijo su padre, y él dijo Esav en su corazón: Se acercan los días del luto de mi padre, y yo mataré a Ya’akov mi hermano. (27:42) Y fue dicho a Rivqah las palabras de Esav su hijo el mayor, y ella envió y ella llamó a Ya’akov su hijo el menor y ella dijo a él: He aquí, Esav tu hermano se está consolando por ti para matarte. (27:43) Y ahora mi hijo, escucha a mi voz, y levántate, huye tú a Laván mi hermano a Jarán. (27:44) Y te quedarás con él pocos días, hasta que se vuelva la ira de tu hermano. (27:45) Hasta volverse la furia de tu hermano de ti, y él olvide lo que hiciste a él, y yo enviaré y te tomaré de allí. ¿Por qué seré privada también de ambos vosotros un día uno? (27:46) Y ella dijo Rivqah a Yitzjak: Estoy cansada de mi vida a causa de las hijas de Jet. Si tomando Ya’akov mujer de las hijas de Jet como estas de las hijas de la tierra, ¿para qué a mí vida? (28:1) Y él llamó Yitzjak a Ya’akov y él lo bendijo a él y él le ordenó y él dijo a él: No tomes mujer de las hijas de Kena’an. (28:2) Levántate, ve a Paddán Aram a casa de Betu’el el padre de tu madre, y toma para ti de allí mujer de las hijas de Laván el hermano de tu madre. (28:3) Y El Shadday te bendiga a ti y te haga fructífero y te multiplique, y seas una congregación de pueblos. (28:4) Y te dé a ti la bendición de Avraham, a ti y a tu descendencia contigo, para que heredes la tierra que de tus moradas, la que dio Elohím a Avraham.
Comentario Mesiánico de la Porción de la Toráh
Esta Aliyáh es crucial porque revela la inmutabilidad de la Bendición del Pacto y el propósito redentor de Adonái. A pesar del engaño de Ya’akov y Rivqah, la bendición pronunciada por Yitzjak es confirmada. En el clímax de su terror (jă-rā-dáh gedō-lāh ‘ad-me-’ōd – estremecimiento grande hasta el extremo), Yitzjak no anula la bendición, sino que la ratifica: “¡También bendito será!” (Gam bārūkh yihyeh).
El comentario mesiánico aquí se centra en que la soberanía de Elohím prevalece sobre el error y el pecado humanos. La bendición de Ya’akov no se basó en la ética de su acción, sino en el decreto divino (Rom 9:10-13, donde Sha’ul usa la elección de Ya’akov sobre Esav como ejemplo de la elección soberana de Adonái).
La bendición de dominio sobre las naciones (Gén 27:29: ya-‘av-dú-khā ‘ammîm) y de ser una fuente de bendición universal para todos los que le bendicen, no es solo terrenal; es la promesa mesiánica que se cumple en Yeshúa haMashíaj. Yeshúa, el descendiente de Ya’akov, es el verdadero Gevir (Señor/Príncipe) sobre Sus hermanos (la Casa de Yisra’el) y sobre todas las naciones (le-’um-mîm).
La bendición final y formal que Yitzjak otorga a Ya’akov en 28:3-4 es la más pura y libre de engaño: la Bendición de Avraham (bir-kaṯ ’Av-rā-hām), que incluye la promesa de la tierra y la de ser una congregación de pueblos (liq-hal ‘ammîm). Es una bendición que mira al futuro, al pacto eterno, y asegura que de Ya’akov vendrá la línea por la cual el Mesías, la simiente prometida, heredará las naciones y traerá la redención. La bendición de El Shadday (’Ēl Shad-day), el Elohím Todopoderoso y autosuficiente, garantiza el cumplimiento de la promesa, asegurando la continuidad del plan redentor de Yeshúa haMashíaj.
2. Haftaráh: Oseas 12:13 – 14:9 (La Redención y el Retorno de Yaakov)
La Haftaráh nos lleva a Oseas, un profeta que confronta a Yisra’el por su infidelidad, pero que siempre ofrece la esperanza incondicional de la teshuváh (arrepentimiento/retorno) y la redención.
Texto (Oseas 12:13-14:9)
Me concentraré en los versos clave que establecen la conexión directa con la Parashá y el tema de la redención.
| Texto Hebreo (Tiberiana) | Palabras y Fonética | Traducción Palabra por Palabra |
| (12:13) וַיִּבְרַח | Wa-yiv-rāh | Y-huyó |
| יַעֲקֹב | Ya-‘ă-qōv | Ya’akov |
| שְׂדֵה | Śə-ḏēh | al-campo-de |
| אֲרָם | ’Ă-rām | Aram |
| וַיַּעֲבֹד | Wa-ya-‘ă-vōd | y-sirvió |
| יִשְׂרָאֵל | Yis-rā-’ēl | Yisra’el |
| בְּאִשָּׁה | Bə-’ish-šāh | por-una-mujer |
| וּבְאִשָּׁה | Ū-və-’iš-šāh | y-por-una-mujer |
| שָׁמָר | Šā-mār | guardó |
| (14:5) אֶרְפָּא | ’Er-pā’ | Yo-sanaré |
| מְשׁוּבָתָם | Mə-shū-vā-ṯām | su-reincidencia |
| אֹהֲבֵם | ’Ō-hă-vēm | Los-amaré |
| נְדָבָה | Nə-ḏā-vāh | voluntariamente |
| כִּי | Kî | porque |
| שָׁב | Šāḇ | se-ha-apartado |
| אַפִּי | ’Ap-pî | Mi-ira |
| מִמֶּנּוּ | Mim-mén-nū | de-él |
Comentario Mesiánico: Conexión con la Parashá y Promesas Mesiánicas
La Haftaráh en Oseas 12 comienza de manera impactante al referenciar directamente a Ya’akov: “Y huyó Ya’akov al campo de Aram” (Oseas 12:13), un eco directo de Génesis 27:43 donde Rivqah instruye a Ya’akov a huir a Jarán (en Paddán Aram). El profeta usa la vida de Ya’akov —el engaño, la huida, el servicio por las esposas— como una analogía histórica para el estado espiritual de la Casa de Yisra’el en su tiempo. Al igual que Ya’akov huyó por temor a Esav (su hermano) a causa de un engaño (suplantación), Yisra’el se había alejado de Adonái (su Padre) a causa de la infidelidad (la idolatría).
La conexión mesiánica radica en el mensaje de Restauración. El profeta Oseas, a pesar de las referencias a los errores de Ya’akov, concluye con una de las más bellas promesas de redención incondicional y sanación (Oseas 14:5-9). Adonái promete sanar la reincidencia de Yisra’el y amarlos por nə-ḏā-vāh (voluntariamente/liberalmente).
Esta sanación y retorno apuntan directamente a la obra de Yeshúa haMashíaj. Si Ya’akov fue el patriarca que, a través de la providencia de Elohím, obtuvo la bendición para ser el canal del pacto, Yeshúa es el Agente del Perdón y la Sanación. La promesa de que la ira se apartará es el cumplimiento del Nuevo Pacto, donde la transgresión es perdonada a través del sacrificio de Mashíaj. Yeshúa, en su identidad como el verdadero Yisra’el (Juan 1:47, ver punto 3), es quien permite que la “reincidencia” del pueblo sea borrada y que Yisra’el florezca como el lirio y extienda sus raíces, como se profetiza en Oseas 14. La redención mesiánica, que comenzó con la elección y el escape de Ya’akov, se sella con el retorno y la sanación en Yeshúa.
Aplicación Espiritual
La Haftaráh nos enseña una verdad espiritual profunda para los creyentes hoy: El pasado turbulento (Ya’akov huyendo, Yisra’el reincidiendo) no es el fin de la historia. El plan de Elohím es redención y restauración. La aplicación es que, a pesar de nuestros propios “engaños” o infidelidades (nuestro pecado), la fidelidad de Adonái es el fundamento de nuestra esperanza.
La esperanza en la redención se conecta con la figura de Mashíaj como el Sanador (’Er-pā’ – Yo sanaré). Para el creyente en el Reino de Yeshúa, el retorno (teshuváh) es posible no por la fuerza de voluntad, sino porque Adonái promete amarnos voluntariamente y sanar nuestra raíz pecaminosa. Esta porción nos invita a vivir en la seguridad de que la promesa de Avraham (Génesis 28:4) se realiza en el Nuevo Pacto, donde la Comunidad Mesiánica es plantada por el Ruaj HaKodesh para florecer y extender la fragancia del Reino.
3. Brit Hadasháh: Juan 1:47-51 (Yeshúa, el Descendiente de Yaakov)
Esta es una sección sumamente rica, pues nos presenta a Yeshúa reconociendo a Natana’el como el verdadero Yisra’el, haciendo una alusión directa a la historia de Ya’akov.
Texto Arameo-Español (Peshita)
| Texto Arameo (Siríaco Oriental) | Palabras y Fonética | Traducción Palabra por Palabra |
| (1:47) חֲזָא | Jzā | Vio |
| יֵשׁוּע | Yeshūa’ | Yeshúa |
| לְנָתַנָאֵיל | l-Nātanā’ēl | a-Natana’el |
| דּאָתֵא | d-’āṯē’ | que-venía |
| לוֹתֵהּ | lōṯēh | hacia-él |
| וַאֲמַר | wa-’ămar | y-dijo |
| עֲלוֹהִי | ‘alōhī | sobre-él |
| הָא | Hā | He-aquí |
| שְׁרָרָאִית | šrārā’īṯ | verdaderamente |
| בַּר | bar | hijo-de |
| אִישׁ | ’īš | un-hombre |
| מִן | min | de |
| יִשְׂרָאֵל | Yisrā’ēl | Yisra’el |
| דּלָא | d-lā’ | que-no |
| אִית | ’īṯ | hay |
| בֵּהּ | bēh | en-él |
| נַכִּילּוּתָא | nakkīllūṯā’ | engaño |
| (1:51) וַאֲמַר | wa-’ămar | Y-dijo |
| לֵהּ | lēh | a-él |
| אָמֵן | ’āmēn | Amén |
| אָמֵן | ’āmēn | Amén |
| אֲמַר | ’ămar | Digo |
| אֲנָא | ’ănā’ | Yo |
| לְכוֹן | l-kōn | a-vosotros |
| דּתֶּחְזוּן | d-teḥzūn | Que-veréis |
| שְׁמַיָּא | šmayyā’ | los-cielos |
| דּܦְתִיחִין | d-pṯīḥīn | que-están-abiertos |
| וּמַלְאָכֵי | ū-mal’āḵē | y-malajím-de |
| אֱלָהָא | ’Elāhā’ | Elohá |
| דּסָלְקִין | d-sāleqīn | que-suben |
| וְנָחֲתִין | wə-nāḥăṯīn | y-descienden |
| עַל | ‘al | sobre |
| בְּרֵהּ | b-rēh | el-Hijo-de |
| דְּאִינָשָׁא | d-’īnāšā’ | el-Hombre |
Comentarios Exhaustivos y Reflexión Mesiánica
El pasaje de Juan 1:47-51 es la clave de la conexión (Toráh-Haftaráh-Brit Hadasháh) de esta Aliyáh.
Conexión con la Toráh y Haftaráh:
- La Ausencia de Engaño: Yeshúa declara sobre Natana’el: “He aquí verdaderamente un hijo de un hombre de Yisra’el, que no hay en él engaño (nakkīllūṯā’)” (Juan 1:47). Esta declaración resuena directamente con la narrativa de Ya’akov. El nombre Ya’akov (יַעֲקֹב, Ya’ăqōv) está etimológicamente ligado a la idea de “suplantar” o “engañar” (Génesis 27:36, wa-yya‘-qə-vē-nî – y me suplantó). Natana’el es contrastado con Ya’akov, el Akev (talón, suplantador). Yeshúa, el Mesías, busca y bendice al verdadero Yisra’el, aquel que manifiesta la pureza de intención que no estuvo presente en el encuentro de Ya’akov con Yitzjak. Mashíaj redime el nombre de Yisra’el, volviendo a la nación a su propósito original de ser “Príncipe con Elohím” sin la sombra del engaño.
- La Escalera de Ya’akov: La culminación del pasaje es la referencia a la escalera (Juan 1:51), un eco directo de la visión de Ya’akov en su huida a Jarán (Génesis 28:12), que ocurre inmediatamente después de esta Aliyáh. Yeshúa dice: “veréis los cielos que están abiertos y malajím de Elohá que suben y descienden sobre el Hijo del Hombre” (b-rēh d-’īnāšā’). Yeshúa se identifica como el punto de encuentro, la Escalera (Sullam) misma, que conecta a Adonái con la humanidad. Si Ya’akov vio la conexión entre el Cielo y la Tierra en un lugar, Yeshúa es esa conexión, la morada de Elohím.
Reflexión Mesiánica: La Divinidad de Yeshúa (MarYah como Ejad):
La declaración de Yeshúa en Juan 1:51 es, en mi opinión, una de las declaraciones más profundas de Su divinidad en el Brit Hadasháh. Al posicionarse como el punto focal para los malajím (mensajeros celestiales), Él reclama para sí una identidad que la tradición judía (Midrash) atribuía al mismo Elohím o a Yisra’el como nación.
En el texto arameo Peshita, el uso de nombres y títulos es crucial. La idea de la unidad inquebrantable entre el Creador, Adonái (יהוה, cuyo equivalente en arameo es MarYah) y Yeshúa haMashíaj, está fuertemente implícita. Cuando Yeshúa se llama a Sí mismo el “Hijo del Hombre” (b-rēh d-’īnāšā’), está usando un título profético del profeta Dani’el (7:13) que denota realeza divina y soberanía eterna.
La fe Judío Mesiánica mantiene la fe monoteísta de Yisra’el: Adonái es Ejad (Uno). Yeshúa no es una deidad separada, sino la manifestación del mismo Elohím (el Alef Tav) en la carne. El hecho de que Él sea la escalera, el único canal de comunicación entre el Cielo y la Tierra (la misma función que la Shejináh – Presencia de Adonái – realiza), es una afirmación de que Él es MarYah con nosotros. No hay una separación entre el Eterno y Yeshúa haMashíaj; son uno y el mismo, la única fuente de la bendición de Avraham y la herencia de Ya’akov.
4. Contexto Histórico y Cultural
Este pasaje se sitúa en el periodo patriarcal, pero su trascendencia resuena en las instituciones y el pensamiento de Yisra’el durante siglos.
Periodo Patriarcal y Mishkan (Tabernáculo):
La bendición de Yitzjak es un acto de transferencia de autoridad sacerdotal y real. El acto de la bendición, pronunciada por el Patriarca (el Rosh Ha-Mishpajáh o cabeza de familia), era vinculante e irreversible. Culturalmente, la primogenitura (bə-ḵō-rāh) no era solo el doble de la herencia, sino el liderazgo espiritual y la continuación del pacto. El rol del Mishkan, siglos después, sería la materialización del concepto de la Escalera de Ya’akov: un lugar donde lo terrenal y lo celestial se encuentran, y donde la Presencia de Adonái (Shejináh) desciende. Yeshúa, al ser el Kōhēn Gāḏōl (Sumo Cohén) y la Escalera, se convierte en el Mishkan viviente (Juan 1:14).
El Primer y Segundo Templo:
Durante el periodo de los Templos, la bendición profética y la elección de Ya’akov eran vistas como la fundación misma de Yisra’el. La diáspora (el exilio) era entendida como un juicio por haber roto los términos del pacto, recordando la huida de Ya’akov al exilio en Jarán (Gén 28:5). La esperanza del retorno y la redención (el tema de Oseas) era central. El Mesías esperado era el que restauraría el Templo y el Reino, siendo el descendiente perfecto de Ya’akov/Yisra’el, libre del nakkīllūṯā’ (engaño) que plagó a los patriarcas.
Qumrán y Escritos Mesiánicos y Nazarenos:
Los Rollos del Mar Muerto (Qumrán) muestran una gran expectativa mesiánica. El rollo 11QMelchizedek, por ejemplo, habla de una figura mesiánica liberadora. Aunque la comunidad de Qumrán era ascética y crítica del sacerdocio del Segundo Templo, compartían la visión de un Mesías que restauraría el sacerdocio perfecto y el reino. Los escritos nazarenos (los Evangelios y Cartas del Brit Hadasháh) sitúan a Yeshúa como el cumplimiento de esta figura, la simiente prometida. El pasaje de Juan (1:51), con la Escalera y el Hijo del Hombre, es una exégesis nazarena de Génesis 28, posicionando a Yeshúa como el verdadero Bet-El (Casa de El/Elohím) que Ya’akov fundó.
5. Estudio, Comentarios y Conexiones Proféticas
Comentarios Rabínicos
El evento de la bendición de Ya’akov es uno de los pasajes más debatidos en la tradición rabínica. Los comentaristas clásicos lucharon por reconciliar el acto de engaño con la legitimidad de la bendición.
- Rashi (Rabbi Shlomo Yitzjaki): Rashi, para ser honesto, interpreta el acto de Ya’akov como la materialización de un derecho que ya le pertenecía legalmente (la primogenitura fue comprada en Génesis 25:34). Yitzjak, al estar espiritualmente confundido por su ceguera y su apego a Esav, necesitaba la intervención divina (a través de Rivqah) para que la bendición cayera sobre el receptor divinamente elegido. La Jă-rā-dáh Gedō-lāh (gran estremecimiento) de Yitzjak (Gén 27:33) no es solo por el engaño, sino el reconocimiento profético de que Adonái había confirmado la bendición a pesar de su intención original. Al exclamar, “¡También bendito será!” (Gam Bārūkh Yihyeh), Yitzjak acepta la voluntad del Cielo.
- Ramban (Najmánides): Ramban enfatiza la soberanía. Aunque hubo engaño, la bendición de Yitzjak sobre Ya’akov fue profética. Una vez que la palabra sale de la boca del Patriarca, y especialmente una palabra vinculada al pacto, se convierte en un decreto divino irreversible. La bendición de Yitzjak no fue un deseo personal, sino una declaración del plan de Adonái.
- Comentarios del tiempo del Segundo Templo: Este periodo, influenciado por la lucha histórica entre Yisra’el y Edom/Roma (descendientes de Esav), vio la historia de Ya’akov y Esav como una profecía de la lucha entre el Reino de Elohím y el mal. La sumisión de Edom (Esav) a Yisra’el (Ya’akov), profetizada en Génesis 27:40, era el motor de la esperanza en la redención final. La bendición es la garantía de la supremacía de Yisra’el en los últimos días.
Comentario Judío Mesiánico y Notas de los Primeros Siglos
Desde una perspectiva de la Fé Judío Mesiánica, el pasaje es una poderosa tipología de la Justicia por la fe y la Gracia Soberana, en lugar de las obras humanas.
- Vínculo Profético a Yeshúa haMashíaj: Yeshúa es el cumplimiento perfecto del nombre Yisra’el (Príncipe con Elohím).
- Tipología de la Bendición: La bendición de Yitzjak no pudo ser revocada. De la misma manera, el Pacto de Adonái a través de Yeshúa haMashíaj es un decreto irreversible. Aunque Ya’akov operó en la imperfección, su bendición fue ratificada. Nosotros, la Kehiláh Mesiánica, recibimos la Birkaṯ ’Avrāhām (Bendición de Avraham) no por nuestros méritos o engaños, sino por la gracia inmutable de Yeshúa (Gálatas 3:14).
- El Clamor Amargo de Esav (Gén 27:34): El “clamor grande y amargo hasta el extremo” (Tze-‘ā-qāh Gedō-lāh U-mā-rāh ‘Ad-me-’ōd) de Esav por la bendición que rechazó previamente (la primogenitura) es un tipo profético de aquellos que desprecian la redención de Yeshúa, pero solo se lamentan cuando ya es demasiado tarde (Hebreos 12:16-17).
- Notas Nazarenas: Los primeros discípulos, o sea, los nazarenos, entendieron que Yeshúa, al ser el Hijo del Hombre (Juan 1:51), era la manifestación final de la línea elegida de Ya’akov. La profecía de la bendición de Avraham (liq-hal ‘ammîm – ser una congregación de pueblos, Gén 28:3) se cumple al injertar las naciones en el pueblo de Yisra’el a través del Mashíaj (Romanos 11).
Anotaciones Gramaticales, Léxicas y Guematría
- Léxico: Jă-rā-dáh (חרדה): La palabra para “estremecimiento” o “temblor” utilizada en Génesis 27:33 cuando Yitzjak se da cuenta del engaño es extremadamente intensa. Sugiere un pánico trascendental, no solo por el error personal, sino por la revelación de la mano de Adonái en el evento.
- Léxico: Ya-‘aqōv (יעקֹב): El nombre se usa en un juego de palabras, conectándolo con ‘āqav (עקב, suplantar, retener el talón) en 27:36. Esav dice: wa-yya‘-qə-vē-nî zeh fa-‘ă-má-yim (“y me suplantó esta dos veces”). Esav reconoce que Ya’akov ha vivido a la altura de su nombre, pero la Kehiláh Mesiánica entiende que Yeshúa redime ese nombre, manifestando el verdadero Yisra’el sin engaño.
- Guematría: El valor numérico de la palabra בְּרָכָה (Bə-rā-ḵāh, bendición) es 217. Este número no se usa directamente en el texto, pero el concepto de la Bə-rā-ḵāh es la fuerza motriz del universo patriarcal. La Guematría de יִצְחָק (Yitzjāq) es 208, y la de יַעֲקֹב (Ya’ăqōv) es 182. A menudo, el estudio se enfoca en cómo la unión de sus propósitos se conecta con otros conceptos, aunque la primacía siempre es la soberanía de Adonái.
6. Análisis Profundo de la Aliyáh
La Aliyáh 6 es la bisagra que conecta la intención humana (engañosa) con la elección divina (inmutable).
Análisis y Comentario Judío y Mesiánico
La escena en Génesis 27 está llena de ironía dramática. El hecho de que Yitzjak no pueda retractarse de la bendición una vez pronunciada subraya la naturaleza creativa y performativa de la palabra. La bendición es más que un simple deseo; es una transferencia de energía pactual, una profecía con fuerza legal y espiritual.
- Toráh (Génesis 27:33): La ratificación de Yitzjak es el punto de inflexión. No dijo: “Cometí un error, la anulo.” Sino, “¡También bendito será!” Esto, creo yo, es el reconocimiento de la intervención del Ruaj HaKodesh (Espíritu de Santidad), forzando a Yitzjak a alinear su voluntad con la elección de Adonái. Esta es la garantía para Yisra’el: las promesas no dependen de la perfección del Patriarca, sino de la fidelidad del Eterno.
- Haftaráh (Oseas 12:13): Al mencionar la huida de Ya’akov a Aram, Oseas establece un patrón profético de castigo y exilio (por el engaño/infidelidad de Yisra’el), seguido por la restauración. El Mesías, Yeshúa, es el que rompe ese ciclo, cumpliendo la profecía de restauración (Oseas 14) al traer la sanación y el amor incondicional.
- Brit Hadasháh (Juan 1:47-51): Yeshúa es la respuesta definitiva al dilema de Ya’akov. Natana’el, el “Yisra’el en el que no hay engaño” (un Yisra’el ideal), encuentra en Yeshúa la manifestación del Mesías, el verdadero Heredero de la bendición de Ya’akov. El Mashíaj, libre de cualquier nakkīllūṯā’, es el garante de que la Bə-rā-ḵāh pactual se extiende finalmente al mundo.
7. Tema Más Relevante de la Aliyáh
El tema central de la Aliyáh 6 es: La Inmutabilidad de la Elección Pactual y la Provisión Soberana.
La elección de Adonái (de Ya’akov sobre Esav) no se basa en el carácter impecable (Esav despreció la primogenitura, Ya’akov la deseó y la obtuvo con engaño), sino en el propósito divino. La Aliyáh es importante en el contexto de la Toráh porque formaliza el linaje de donde saldrá Yisra’el y, consecuentemente, el Mashíaj. Demuestra que el pacto es un regalo soberano de Adonái, no un salario por la obediencia humana.
Conexión con Yeshúa y la Continuidad Toráh-Brit Hadasháh
El tema se relaciona directamente con Yeshúa:
- Soberanía de Mashíaj: Así como la bendición fue irrevocable para Ya’akov, el Reino y el Sacerdocio de Yeshúa son inmutables. El es el Rey Eterno cuyo dominio no será quebrantado.
- La Bendición de Avraham: La bendición final de Yitzjak (Gén 28:3-4) invoca a El Shadday y asegura la bendición de Avraham (multiplicación y tierra). Esta bendición, la Birkaṯ ’Avrāhām, es el motor de la redención. El Brit Hadasháh enseña que esta bendición se extiende a toda la humanidad por la fe en Yeshúa, el descendiente de Avraham y Ya’akov (Gálatas 3:14). El cumplimiento del pacto se realiza en Él, demostrando la continuidad perfecta entre la Toráh y el Nuevo Pacto.
Conexión Temática con los Moedim de Elohím
Esta Parashá, y específicamente esta Aliyáh, se conecta temáticamente con Sukkot (Tabernáculos), un Moed (Tiempo Fijo) fundamental.
- Rocío y Cosecha: La bendición de Ya’akov promete “rocío de los cielos y las grosuras de la tierra, y abundancia de grano y vino nuevo” (Gén 27:28). Sukkot es la Fiesta de la Cosecha y la Fiesta de la Lluvia/Rocío (de hecho, en Yisra’el se ora por la lluvia después de Sukkot). Simboliza la provisión final de Adonái y la era mesiánica de abundancia.
- La Morada del Rey: Sukkot celebra la Shejináh de Adonái morando con Su pueblo. El pasaje de Juan 1:51, donde Yeshúa es la Escalera de Ya’akov, es la máxima expresión de Sukkot, donde el Cielo y la Tierra se unen en la persona del Mashíaj, el Rey que habita (sukka) entre nosotros.
8. Descubriendo a Mashíaj en cada Aliyah
La Aliyáh 6 está saturada de patrones redentores que revelan a Yeshúa haMashíaj.
Profecías Mesiánicas y Reflexión
- Identificación de Profecías Mesiánicas (Gén 27:29, 28:3-4):
- “Sé señor a tus hermanos” (He-vēh Gevîr Le-’a-jé-khā): Esta es una profecía de dominio y realeza. El Gevir (Señor/Príncipe) por excelencia es Yeshúa haMashíaj, a quien el Padre ha dado todo dominio sobre Yisra’el y las naciones.
- “Y seas una congregación de pueblos” (Wə-hā-yî-ṯā Li-qə-hal ‘Ammîm): Esta es la promesa de la Kehiláh Mesiánica global, la congregación espiritual que abarca tanto a los hijos de Yisra’el como a las naciones que se unen a Su pacto a través de Yeshúa.
Métodos para Descubrir al Mashíaj
| Método de Análisis | Aplicación Mesiánica en Gén 27:28 – 28:4 |
| Tipos (Tipologías) y Sombras (Tzelalim) | Ya’akov es un tipo defectuoso de Yisra’el, pero su destino de obtener la bendición inmutable es la sombra de Yeshúa, el Yisra’el sin engaño. La bendición es la sombra del Nuevo Pacto. |
| Figuras y Patrones Redentores (Tavnitot) | El patrón de “engaño-huida-retorno-redención” de Ya’akov es un patrón redentor que se cumple y se perfecciona en Mashíaj. Yeshúa, en Su primera venida, “huyó” del mundo al Madero y al poste, para luego “retornar” con la plena bendición del Padre, la cual Él comparte con todos nosotros. |
| Nombres y Títulos Proféticos | El título El Shadday (Gén 28:3) es usado por Yitzjak. Este título subraya el poder de Adonái para hacer fructífero y cumplir el pacto, una cualidad esencial de Yeshúa como el Verbo de Elohím que ejecuta el poder de El Shadday. |
| Eventos Simbólicos | La Escalera de Ya’akov (posterior a la Aliyáh, pero conectada por el Brit Hadasháh en Juan 1:51) es el evento simbólico clave: Yeshúa es el mediador, la puerta de conexión entre Cielo y Tierra (Gén 28:12; Juan 10:9). |
| Midrashim Mesiánicos | Muchos Midrashim vieron al Mesías como el que resolvería la disputa entre Ya’akov y Esav. El Midrash Mesiánico nos enseña que Yeshúa, al ser el Rey, asume el dominio profetizado sobre todas las naciones (incluyendo a los descendientes de Esav/Edom/Roma), logrando la paz definitiva. |
| Cumplimientos Tipológicos en el Brit Hadasháh | Gálatas 3:14 afirma que la bendición de Avraham es para los goyim (naciones) a través de Yeshúa. Romanos 9:10-13 usa la elección de Ya’akov sobre Esav como la base teológica para la elección soberana de Adonái que culmina en Yeshúa. |
9. Midrashim, Targumim, Textos Fuentes y Apócrifos
Midrashim
El Midrashim refleja la complejidad de esta historia.
- Tanjuma (Toledot 12): Enfatiza que Yitzjak, a pesar de su ceguera física, tenía una visión espiritual y que el Ruaj HaKodesh se posó sobre él. Cuando Yitzjak sintió la piel de cabrito en el cuello de Ya’akov, el Midrash dice que sintió un estremecimiento (la Jă-rā-dáh) porque se dio cuenta de que Yitzjak estaba en presencia de alguien que estaba dispuesto a morir, como Yitzjak en el Monte Moriah. El Midrash sugiere que Yitzjak sabía que algo no estaba bien, pero el pánico le vino al confirmar la voluntad de Adonái que él intentaba frustrar.
- Midrash Rabbah (Bereshit 67:2): Detalla que la ira de Esav no es solo por la bendición, sino por la primogenitura. Su clamor amargo es visto como un preludio de los clamores de aquellos que serán juzgados en la era mesiánica, aquellos que despreciaron su herencia espiritual.
Targumim
Los Targumím (traducciones/paráfrasis arameas) ofrecen aclaraciones teológicas importantes.
- Targum Onkelos (Gén 27:28): Traduce “el rocío de los cielos y las grosuras de la tierra” de manera literal, pero enfatiza la bendición material como manifestación de la bendición pactual.
- Targum Yerushalmi (Gén 27:29): Traduce: “pueblos te servirán y se postrarán a ti naciones.” Esto refuerza la idea de soberanía mesiánica. Lo más notable es que a menudo interpretan la bendición de Ya’akov como una profecía del Mesías, el Rey de Yisra’el, a quien todas las naciones servirán al final de los días.
Textos Apócrifos
- Libro de Jubileos (Jubileos 27:1-18): Este texto, altamente valorado en Qumrán, presenta una versión donde Rivqah y Ya’akov no son culpables de engaño, sino que actúan bajo la dirección profética para asegurar la bendición a quien le corresponde por designio de Adonái. En Jubileos, el énfasis está en que Esav y sus hijos (Edom) son inherentemente malvados y excluidos del pacto de forma permanente, reforzando la elección de Ya’akov como la única línea pura del pacto.
10. Mandamientos Encontrados o Principios y Valores
Aunque esta Aliyáh no contiene mitzvot (mandamientos) formales del tipo “harás” o “no harás,” extraemos principios fundamentales del Reino:
- Valor de la Palabra (Gén 27:33, 37): La palabra pronunciada por el Patriarca tiene un poder irreversible. Principio: La fidelidad de Adonái a Su Palabra (Toráh y promesas). En el Brit Hadasháh, esto se traduce en la absoluta confianza en la palabra de Yeshúa haMashíaj: Él es el Verbo de Elohím (Juan 1:1), y Su palabra es Vida Eterna (Juan 6:63).
- Principio de la Prohibición de Matrimonio Mixto (Gén 28:1-2): Yitzjak le ordena a Ya’akov no tomar mujer de Kena’an, sino de su propia familia en Paddán Aram. Principio: La necesidad de preservar la pureza del linaje del pacto y la separación espiritual de las naciones idólatras. En la Kehiláh Mesiánica, esto se aplica espiritualmente como la orden de no unirse en “yugo desigual” (2 Corintios 6:14), manteniendo la santidad y la identidad dentro del Reino de Yeshúa.
- El Valor del Liderazgo Espiritual (Gén 27:29): La bendición confiere liderazgo sobre los hermanos. Principio: El liderazgo en el Reino debe estar centrado en la unción pactual de Adonái, no en la capacidad humana (como la caza de Esav). Yeshúa es el líder y pastor perfecto que gobierna a través de Su Ruaj HaKodesh.
11. Preguntas de Reflexión
Aquí te propongo 5 preguntas para un debate profundo en la Kehiláh:
- ¿Cómo reconciliamos la soberanía inmutable de Adonái con el hecho de que Rivqah y Ya’akov usaron el engaño? ¿Podemos argumentar que el engaño fue una herramienta permitida por Elohím, o debemos verlo como una falla humana que Adonái redimió para cumplir Su propósito?
- Yitzjak experimentó una Jă-rā-dáh Gedō-lāh (gran estremecimiento) al descubrir el engaño. ¿Era este un miedo por su error, o el reconocimiento profético de que Adonái había actuado a pesar de su voluntad? ¿Qué nos enseña esto sobre la voz del Ruaj HaKodesh en nuestras vidas?
- La bendición de Esav (Gén 27:39-40) incluye la profecía de que se liberará del yugo de Ya’akov. ¿Cómo se ha cumplido este yugo en la historia (entre Yisra’el y Edom/Roma)? Y, ¿cómo se relaciona la liberación de Esav con la redención universal ofrecida por Yeshúa haMashíaj?
- Yeshúa llamó a Natana’el el “Yisra’el sin engaño” (d-lā’ ’īṯ bēh nakkīllūṯā’). ¿Qué significa ser un “Yisra’el sin engaño” en el contexto de la Fe Judío Mesiánica? ¿Cómo debemos los creyentes en Yeshúa despojarnos de nuestro propio “Ya’akov” suplantador para convertirnos en el “Yisra’el” que Adonái desea?
- La bendición es la de Avraham, centrada en la multiplicación y la tierra. ¿Cómo entiende la Kehiláh Mesiánica la promesa de la tierra (’Eretz) en el Nuevo Pacto? ¿Es una promesa puramente geográfica o tiene un cumplimiento espiritual/escatológico en el Reino de Yeshúa?
12. Resumen de la Aliyáh
La Aliyáh 6 de Toldot narra el momento crucial en que Yitzjak, creyendo bendecir a Esav, transfiere la Bendición Pactual (la de Avraham) a Ya’akov. A pesar del engaño de Ya’akov y Rivqah, la bendición es ratificada por Yitzjak al descubrir la verdad (“¡También bendito será!”). Esav responde con un clamor amargo y una promesa de asesinato. Rivqah, enterada del plan, urge a Ya’akov a huir a Paddán Aram, a casa de Laván, por la doble razón de su seguridad y la necesidad de tomar esposa dentro del linaje del pacto. Yitzjak formaliza esta orden con una bendición pura de El Shadday, asegurando la continuidad del pacto de Avraham y la promesa de ser una “congregación de pueblos” (liq-hal ‘ammîm).
Aplicación en Mashíaj
Este pasaje es un testimonio de la soberanía de Adonái sobre el error humano. La aplicación en Mashíaj es total:
- Yeshúa es la Bendición Inmutable: La ratificación de la bendición a Ya’akov es una sombra del pacto sellado en Yeshúa, que es incondicional e irrevocable para aquellos que son llamados.
- Yeshúa es la Escalera: Al huir, Ya’akov está a punto de tener la visión de la escalera (Gén 28). Yeshúa, el Hijo del Hombre, es la materialización de esa escalera, el único punto de acceso al Cielo y el canal de la bendición de Avraham. Él es el verdadero Yisra’el que hereda la bendición y la extiende a la Kehiláh.
13. Tefiláh de la Aliyáh
Baruj Atah Adonái Elohím, Rey del Universo, por la luz de Tu Toráh.
Adonái, nuestro Elohím, nos postramos ante Ti, reconociendo Tu soberanía que prevalece sobre nuestra debilidad y nuestro engaño. Así como Tú ratificaste la bendición sobre Ya’akov, aun en medio del error, te pedimos que Tú ratifiques Tu gracia y Tu favor sobre la Kehiláh Mesiánica.
Ruaj HaKodesh, ayúdanos a ser ese Yisra’el sin engaño que Tú deseas, limpio de nakkīllūṯā’ en nuestros corazones y en nuestras acciones. Que la Jă-rā-dáh de Yitzjak, ese estremecimiento de la revelación divina, nos haga reconocer Tu mano en todos los caminos de nuestra vida, llevándonos a alinear nuestra voluntad con Tu plan perfecto.
Yeshúa haMashíaj, Tú eres la bendición misma de Avraham hecha carne. Tú eres el El Shadday que nos multiplica y nos hace una congregación de pueblos. Te honramos como nuestra Escalera, el único camino entre el Cielo y la Tierra. Protégenos de la ira y la amargura de nuestro “Esav” interior. Permítenos habitar en Tu Presencia para que podamos heredar las promesas de la Tierra y la Vida Eterna, en el cumplimiento total del Nuevo Pacto.
Que Tu dominio, oh Gevir (“Amo,” “Patrón,” “Gobernante,” o “Príncipe.”) sobre todo, se manifieste en la tierra. Amén.
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